Tuesday, January 8, 2019

पद्मासन कैसे करे ? पदमासन की विधि,लाभ जाने

पद्मासन कैसे करे ? पदमासन की विधि,लाभ जाने ।

पदमासन:-

पदमासन संस्कृत भाषा से निकला हुआ शब्द है या ये कह सकते है कि पदमासन की उत्पत्ति संस्कृत से हुई है जिसका अर्थ होता है-कमल जैसी मुद्रा। अर्थात पदमासन की मुद्रा या स्थिति कमल के फूल जैसी होती है
तथा पदमासन योगासन का एक ऐसा आसन है जो अकेले ही सभी प्रकार के शारारिक, मानसिक, बौद्धिक विकास करने में समर्थ है। पदमासन का प्रयोग प्राचीन काल में ऋषि मुनि अपने ध्यान/मन को एकाग्र करने के लिए किया करते थे।

यह आसन व्यक्ति को इस भौतिक पर्यावरण से आध्यात्मिकता की और ले जाता है।

पद्मासन कैसे करे ? पदमासन की विधि,लाभ जाने
पद्मासन कैसे करे ? पदमासन की विधि,लाभ जाने


पदमासन करने की विधि (how to do Padmasan ):-

पदमासन करने की विधि कुछ हद तक सुखासन करने जैसी ही है इन दोनों आसनो में बस कुछ ही steps का फर्क है।

पदमासन करने के लिए निम्न steps को follow करे-

◆सबसे पहले एकदम शांत एवम यदि संभब हो तो प्राकृतिक वातावरण में चटाई बिछाकर बैठ जाये।

◆अपने बाये पैर की एड़ी को दाहिने पैर की जांघ पर तथा दाये पैर की एड़ी को बाये पैर की जांघ पर रखे।

◆ध्यान रहे कि दोनों पैरों के तलवे ऊपर की और हो।

◆कमर तथा गर्दन को सीधा रखें तथा छाती को थोड़ा आगे करते हुए बैठे।

◆अपने दोनों हाथों को घुटनों पर इस प्रकार रखे कि हथेलिया ऊपर की और हो।

◆अब धीरे-2 स्वास को नीचे से ऊपर की और  ले जाये तथा मन को एकाग्र करने की कोशिश करे।

◆यह क्रिया 15 से 30 मिनट तक करे।


पदमासन के लाभ (Benifits of Padmasan):-

●पदमासन शरीर के लिए अतिउत्तम योगासन है यह अकेेले शरीर का शारारिक,मानसिक विकास करने में समर्थ हैं।

●पदमासन शरीर के पाचन तंत्र को दुरुस्त कर पाचन क्रिया को बढ़ाता है।

●पदमासन से रीढ़ की हड्डी के रोगो को  दूर कर इसे मजबूत बनाता है।

●पद्मासन से शरीर के स्वशन तंत्र को सही करता है तथा स्वसन संबंधित रोगों को दूर करता है।

●प्रतिदिन पद्मासन करने से मानसिक विकार दूर होते है।
●इससे जोड़ो का दर्द दूर होता है।

●मंदबुद्धि लोगो के लिए पदमासन रामबाण उपाय है इसका प्रतिदिन अभ्यास करने से मानसिक मंदता दूर होती है।

●पदमासन बौद्धिक विकास के लिए सर्वोत्तम है क्योंकि यह मनुष्य को आध्यात्मिकता की और लेकर जाता है।


पद्मासन करते समय सावधानिया:-

◆साइटिका के रोगी इस आसन को न करे।

◆इस आसन को हमेशा भूखे पेट व सुबह के समय करे।

◆जिन्हें रीढ़ की हड्डी से संबंधित या अन्य जोड़ो से संबंधित रोग हो वे इस आसन को अवश्य करे, लेकिन किसी experts की देख रेख में करे।


Wednesday, December 26, 2018

What is meditation/dhyan | ध्यान क्या है ?

                    What is meditation/dhyan | ध्यान क्या है ?

ध्यान क्या है----

"इस विषय मे महर्षि पतंजलि जी ने योगदर्शन के  अस्विट्भति पाद में वर्णन करते हुए कहाँ है कि साधक जब किसी ध्येय में चित्त को लगाता है और उसी ध्येय में चित्त का एकाग्र हो जाना ध्यान होता है।" 

पतंजलि योग दर्शन https://www.yogyatri.in/2018/08/yoga-sutras-patanjali.html


"ध्यान क्या है" | 

 What is meditation

ध्यान की अवधारणा इस प्रकार है।

संस्कृत शब्दार्थ कौस्तुभ के अनुसार--
ध्यान शब्द की व्युत्पति 'ध्यै' धातु में 'ल्युट्' प्रत्यय लगाकर निष्पन्न होता है इसका अर्थ होता है मनन, चिंतन, विचार आदि।
         ---(संस्कृत शब्दार्थ कौस्तुभ---- पृ० 575)

ध्यान क्या है? | what is meditation
what is meditation | ध्यान क्या है?


ध्यान क्या है

यह बताते हुए महर्षि पतंजलि जी योगसूत्र में कहते  है

"तत्र प्रत्यैकतानता ध्यानम्" ।।   (योगसूत्र--३/२)

अर्थात् "जिस स्थान पर धारणा का अभ्यास किया गया है उसी स्थान पर चित्त की एकतानता -निरंतरता बने रहना को ही ध्यान कहते है।"

व्यास जी ने ध्यान के बारे में कहां है---

"तस्मिन् देशे ध्येयालम्बनस्य प्रत्ययस्यैकतानता सदृशप्रवाहः प्रत्ययान्तरेणापरामृष्टो ध्यानम्"
                                                                                                                          (यो. सू. व्यासभाष्य---३/२)

इस सूत्र में ध्यान का स्वरूप बतलाया गया है।
योग जिज्ञासुओ को ध्यान के विषय में विशेष रूप से जानना चाहिए। ईश्वर के स्वरूप को अच्छे प्रकार से जान लेना चाहिए। यदि साधक ईश्वर के स्वरूप को ठीक प्रकार से नही जानते अथवा विपरीत जानते है तो ध्यान में सफलता नही मिलती। जैसे शब्द प्रमाण से यह जान लिया कि ईश्वर सर्व-व्यापक, सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान, आनंदस्वरूप हैं। ध्यान करते समय भी ईश्वर को वैसा ही जानकर उसका ध्यान करना चाहिए। जो वस्तु जैसी है उसको वैसा ही जानकर ध्यान करना चाहिए। ध्यान करते समय जिस पदार्थ का ध्यान किया जाता है उसके अलावा किसी ओर वस्तु का ध्यान भी चित्त में नही आना चाहिए और न ही इन्द्रियों से किसी पदार्थ को देखने का प्रयत्न करना चाहिए अगर ध्यान के बीच मे भी किसी अन्य वस्तु में ध्यान जाये तो भी उसे वही रोक कर वापिस पहले की वस्तु म् ही ध्यान लो लगाने का प्रतान्य कारण चाहिये।


भास्वती टीकाकार हरिहरानन्द जी कहते है कि सदृश्य प्रवाह का अर्थ है जिस ध्येय विषयक पहली वृत्ति हो उसी विषयक दुसरी, तीसरी, चौथी इसी प्रकार की वृत्ति बनी रहे, अन्य व्यवधान रूप वृत्ति न आएं। इसी सदृश्य प्रवाह को तैल की धारा के समान कहा गया है।
( योग सूत्र भास्वती टीका--पृ० २८३)

गोरक्ष संहिता में 'समृ चिंतायाम्' धातु से निष्पन्न  चिंतन अर्थ को ध्यान के संदर्भ में प्रयुक्त किया है----

"समृत्येव सर्वाचिन्तायां धातुरेक: प्रपद्मते।
यश्चिते निर्मला चिंता तद् विध्यानं प्रचक्षते"।।
                                                                 (गोरक्षसंहिता---२/६१)

इस सूत्र में ध्यान का अर्थ प्रकट करते हुए ऋषि दयानन्द कहते है ध्यैय के ज्ञान के अतिरिक्त अन्य पदार्थो के ज्ञान का अभाव हो जाना ही ध्यान है।
इसी बात को स्वामी लक्षणानन्द कहते हैं कि "धारणा के पीछे उसी देश मे ध्यान करने और आश्रय लेने के योग्य जो अन्तर्यामी व्यापक परमेश्वर है, उसके प्रकाश और आनंद में अत्यंत विचार और प्रेम भक्ति के साथ इस प्रकार प्रवेश करना कि जैसे समुद्र के बीच मे नदी प्रवेश करती है। उस समय मे ईश्वर को छोड़ किसी ओर पदार्थ का स्मरण नही करना, किन्तु इसी अंतर्यामी के स्वरूप और ज्ञान में मग्न हो जाना, इसी का नाम ध्यान है"।
गीता में भी कहा गया है---

 'भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्'
                                                                                     --(गीता--8/10)

अर्थात् चंचलरहित निश्चल मन से पहले हृदय कमल में चित्त को स्थिर करे, फिर ऊपर की ओर जाने वाली कुण्डली शक्ति को भूमध्य में प्राण को स्थापित कर उसभक्ति स्वरूप का ध्यान करता हुआ उस दिव्य रूप परम पुरूष परमात्मा को ही प्राप्त होता हैं।

इसी प्रकार गीता के 6/12,13,14 श्लोको में भी ध्यान योग का वर्णन किया है। विवेक मार्तण्ड (वि. मा. ---6/159--160) के अनुसार चित्त का तत्व में निश्चल होना ध्यान कहलाता है।


1. घेरण्ड संहिता---- घेरण्ड संहिता में ध्यान के तीन प्रकार कहे गए हैं--


"स्थूलं ज्योतिस्तथासूक्ष्मं ध्यानस्य त्रिविधं विदुः।
स्थूलं मूर्तिमयं प्रोक्तं ज्योतिस्तेजोमयं तथा।
सूक्ष्मं बिन्दुमयं ब्रह्म कुण्डली परदेवता ।।
                                                             --(घे० सं०-- 6/1)

ध्यान के तीन भेद-- स्थूल, ज्योति तथा सूक्ष्म हैं।
स्थूल ध्यान मूर्तिमय इष्टदेव का ध्यान, ज्योति ध्यान ज्योतिस्वरूप ब्रह्म का ध्यान तथा सूक्ष्म ध्यान कुंडलिनी शक्ति का ध्यान है।

1. स्थूल ध्यान-- इस विधि में गुरु के स्थूल रूप का ध्यान हृदय या सहस्त्रार में करने का विधान है।

"स्वकीय हृदये---------------------------------------- स्थूलध्यानमिदं विदुः।। 
                                                                                                        ---(घेरण्ड संहिता--6/2--8)

अर्थ--

  अपने हृदय का ध्यान करते हुए अमृतसगर की कल्पना करें। उसके बीच रत्नों से पूर्ण द्वीप जिसकी बालू भी रत्नपूर्ण है की कल्पना करें। चारो और से फलदार वृक्ष लगे है। सुगंधित पुष्प मालती, केशर, चम्पा आदि आदि शुशोभित है। योगी द्वीप के मध्य में फलफूल वाले कल्पवृक्ष की कल्पना करें जिसकी चारो शाखाओ में चारों वेद सुशोभित है।  भ्रमरों का गुंजन व कोयल की कूक मन को मोहने वाली है, योगी रत्नों से जड़ित मंडप म् सूंदर पलंग की कल्पना करे, जिसपर इष्टदेव विराजित हो। अब इन्ही इष्ट देव पर ध्यान केंद्रीत करें जैसे गुरु ने शिक्षा दी हो। इसी प्रकार सहस्त्रार पर भी ध्यान करने का उल्लेख है।

2. ज्योति ध्यान-- तेजोमय ब्रह्म के ज्ञान को ज्योति ध्यान कहा गया है।


"मूलाधार कुण्डलिनी------------------------------ तेजोध्यानं तदेव हि"।।
                                                                                                     (घे० सं० 6/ 6-7)
 सर्पिणि की आकार वाली कुण्डलिनी शक्ति मूलाधार चक्र में स्थित है। दीपक की लौ की तरह ज्योति रूप जीवात्मा का वही स्थान है। तेजोमय ब्रह्म का वही पर ध्यान करना ज्योतिध्यान कहलाता है। भ्रूमध्य और मन के उर्ध्व भाग में जो प्रणवात्मक ज्योति है, उस ज्योति रूप प्रणव का ध्यान ही तेजोध्यान है।

3. सूक्ष्मं ध्यान--  कुण्डलिनी शक्ति का ध्यान सूक्ष्म ध्यान कहलाता है।


तेजोध्यानं श्रुतं ----------------------------------------------------------- भवेद्यस्मात्तस्माद् ध्यानं विशिष्यते ।।
                                                                                                                                      --(घे० सं०-- 18-22)



 तुमने तेजोध्यान (ज्योतिध्यान) के विषय मे सुना अब शुक्ष्मध्यान के विषय मे सुनो, अत्यंत शौभाग्य से कुण्डलिनी शक्ति जागृत होती है। आत्मा के साथ संयुक्त हो, वह नेत्र मार्ग से निकलकर उर्ध्व भाग में स्थित राजमार्ग में विचरण करती है। शुक्ष्म और चंचल बुद्धि होने के कारण वह दिखाई नही देती। शाम्भवी मुद्रा में बैठकर योगी कुण्डलिनी शक्ति का ध्यान करे तो यही शुक्ष्म ध्यान है। देवताओं के लिए भी यह ध्यान दुर्लभ है। स्थूल ध्यान से सौ गुणा श्रेष्ठ ज्योतिध्यान तथा ज्योतिध्यान से लाख गुना श्रेष्ठ शूक्ष्मध्यान है। ये बात घेरण्ड ऋषि राजा चण्ड को संबोधित करते हुए बताते है और कहते है कि मैंने यह बहुत दुर्लभ ध्यानयोग कहा है इससे आत्मसाक्षात्कार होता है।

भक्तिसागर-----  भक्तिसागर में स्वामी चरणदास जी ने ध्यान के चार प्रकार कहे है-----

1. पदस्थ ध्यान
2. पिण्डस्थ ध्यान
3. रूपस्थ ध्यान
4. रूपातीत ध्यान

शाण्डिल्योपनिषद् ----- 

दो प्रकार के बताए है।
१. सगुण-- देवप्रतिमा का ध्यान।
२. निर्गुण-- विशुद्धात्मा का ध्यान ।

वशिष्ठ संहिता --  दो प्रकार के ध्यान है ।

सगुण तथा निर्गुण
सगुण के 5 प्रकार है 
निर्गुण 1 ही प्रकार का है।
इसमे भी शगुण ध्यान में भगवान विष्णु के रूपो के व उनके अंगों पर ध्यान करने को कहा गया है।
निर्गुण ध्यान में ब्रह्म स्वरूप ईश्वर का ध्यान करने का वर्णन किया गया है।













Saturday, October 27, 2018

What is dharna| धारणा क्या है?

What is dharna| धारणा क्या है? 


धारणा क्या है इसका महर्षि पतंजलि जी ने योगदर्शन के पहले व दूसरे पाद में अष्टांग योग के बहिरंग साधनों का फल सहित वर्णन किया है। बाकी के तीन अंग धारणा, ध्यान, समाधि अंतरंग योग का  वर्णन आगे देखने/पढ़ने को मिलेगा।
इस पाद में बताया गया है कि जब ये तीनो किसी एक ध्येय में आपने को पूर्णता को प्राप्त करते है तो इनका नाम संयम कहलाता है। क्योंकि योग की विभूति को प्राप्त करने के लिए संयम की आवश्यकता होती है तो इसलिए इसका वर्णन योगदर्शन के इन अङ्गों का वर्णन साधनपाद मे न करके  विभूतिपाद मे किया गया है।
धारणा क्या है इसका वर्णन इस सूत्र में पढ़ने को मिलेगा।

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देशबंधश्चित्तस्य धारणा।।   (योगदर्शन 3/1)

व्याख्या:--

परिभाषा:-

चित्त को किसी एक निश्चितविशेष मे स्थिर कर देना ही धारणा कहलाती है। इस को ऐसे समझ सकते है कि जब योगी ध्यान का अभ्यास करता है तब उसको ध्यान को एकाग्र करने के लिए किसी निश्चित व स्थिर जगह पर ध्यान को एकाग्र करना पड़ता है उसके लिए अभ्यासी किसी भी  वस्तु (जैसे सूर्य, चंद्रमा, कुंडली, ईश्वर का स्वरूप, मूर्ति, नाभिचक्र आदि) को ध्यान में रख कर  उसी में चित्त को एकाग्र कर देता है।

What is dharna| धारणा क्या है?
What is dharna| धारणा क्या है? 


दूसरी परिभाषा:--
योगी/साधक आपने चित्त को अपनी ही इच्छा से अपने ही भीतर किसी भी एक स्थान में स्थिर कर दे तो इसी अवस्था को धारणा कहते है।

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शरीर मे मन को टिकने का स्थान:-
   शरीर मे मन को स्थिर करने के मुख्य स्थान मस्तक, भूमध्य, नासिकाग्र, जिह्वा का अग्र भाग, हृदय, नाभि आदि है, परन्तु इनमे से सर्वोत्तम स्थान हृदय प्रदेश को मन जाता है।(यहां हृदय प्रदेश का अर्थ शरीर के हृदय नामक अंग के स्थान से न होकर छाती के बीच जो गड्ढा होता है उस से है)।
बहुत ऐसे साधक है जो धारणा का अभ्यास लंबे समय से कर रहे है और उनको धारणा ही ध्यान प्रतीत होने लगा है, ऐसा नही करना चाहिए। धारणा केवल मन को टिकाये रखना ही है, और ध्यान धारणा की अगली अवस्था है।


धारणा का अभ्यास कैसे करें--
प्रारम्भ मे शरीर से बाहर ॐ, गायत्री मंत्र आदि मे धारणा कुछ ही समय तक करें, लंबे समय तक शरीर से बाहर धारणा नही करनी चाहिए।
जहाँ धारणा की जाती है वही ध्यान करने का भी विधान है, क्योंकि धरना ओर ध्यान के एक हो जाने से ही समाधि की अवस्था आती है, ओर उसी अवस्था मे प्रभु के दर्शन हो पाते है इसलिए ऐसा भी कहाँ जाता है कि धारणा शरीर के बाहर नही करनी चाहिए।
  योग साधक को आरम्भ में आँखें खोल कर बाहर धारणा का अभ्यास करना चाहिए तथा जैसे जैसे अभ्यास जैसे जैसे गहरा होता जाएगा आंखे बंद कर के भी धारणा लगने लगेगी।

धारणा के लाभ|Benifits of dharna:-

1. मन मे एकाग्रता आती है।
2. मन में जो भी विकार आते है उनको दूर करने में    सहायता मिलती है।
3. मन मे प्रसन्नता आती है, मन शांत होता है, तृप्ति की अनुभूति होती है।
4. यह ध्यान से पूर्व की तैयारी है।
5. ध्यान अच्छा लगता है।
6. मन की चंचलता समाप्त होती है।
मन एकाग्र क्यों नही होता?|
1. सांसारिक मोह माया मे पड़े रहने से।
2. मन मे सात्विक विचारो का आभाव होना।
3. मन जड़ है इस का ज्ञान न रखना।
4. ईश्वर का प्रत्येक कण में वास है इस बात को न मानना।
5. बार - बार मन की टिकाये रखने में संकल्प शक्ति की कमी।
6. मन शांत होता है ये भूलकर उसे चंचल समझना।

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   ऐसे कई कारण है जिससे मन धारणा स्थल पर टिका नही रहता, इन कारणों को जानकर उन्हें दूर करने का अभ्यास करते रहना चाहिए जिससे मन लंबे समय तक टिक रहता है।
साधको द्वारा की गयी गलतियां|
योग साधना में कुछ साधक ऐसे होते है जो धारणा के महत्व को नही समझ पाते और सीधे ध्यान में जाने का प्रयास करने लगते है, इससे नुकसान ये होता है कि उनका न तो ध्यान ही लगता है और न ही वे धारणा में जा पाते है, इससे केवल उनका बहुमूल्य समय व्यर्थ होता है। इसलिए धारणा के बाद ही ध्यान में जाने का विधान बताया गया है।
प्रारंभिक योग साधको, योगियों को ध्यान करते समय ध्यान की अवस्था मे बीच- बीच मे धारणा स्थल का ज्ञान बनाये रखना चाहिए जिससे मन मे भटकाव की अवस्था उत्पन्न न हो पायें।
धारणा भी उसी अवस्था तक सफल होती है जिस अवस्था या जिस लगन से योगी ने योग के प्रारम्भिक पांचो अङ्गों को सिद्ध किया हुआ हो।
 

Tuesday, September 11, 2018

What is Pratyahara | प्रत्याहार क्या हैं??

Pratyahara| प्रत्याहार:--

प्रत्याहार पतंजलि कृत योगसूत्र के अनुसार योग के पांचवें अंग के रूप में आता है।

प्रत्याहार क्या है :-
प्रत्याहार का अर्थ होता है बाह्यवृत्तियों को रोक कर आपने चित्त को अपने ध्येय में लगाना प्रत्याहार हैं।

स्वविषयासम्प्रयोगे चित्तस्वरूपनुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहार: (यो०द० 2/54)
प्रणायाम के पत्र में जो प्राणायाम की विधियां बताई गई है उस अनुसार प्राणायाम का अभ्यास करते रहने से मन तथा इन्द्रिया शुद्ध हो जाती है इसके फलस्वरूप बाह्यवृत्तियों को समेट कर मन मे विलीन कर देना ही प्रत्याहार है। 


What is Pratyahara | प्रत्याहार क्या हैं??
What is Pratyahara | प्रत्याहार क्या हैं??


योगी अपनी साधना काल मे अपनी इन्द्रियों के विषयों का त्याग करके चित्त को अपने ध्येय में लगता है उस समय इन्द्रियों का चित्त में स्वयं से चले जाना और विषयो की तरफ न जाना ही प्रत्याहार सिद्धि की पहचान है।
प्रत्याहार क्या है इसे और भी सरल भाषा मे समझना हो तो ऐसे समझ सकते है कि सांसारिक भोग और विलाषिता सामने होते हुए भी उस तरफ खयाल ही न जाये तो उसे प्रत्याहार कहते है। प्रत्याहार के सिद्ध होनेपर प्रत्याहार के समय साधक को ब्रह्मज्ञान नही रहता। जब वह समाजिक व्यवहार के समय उसको ब्रह्मज्ञान आता है क्योंकि उस समय साधक शरीर यात्रा के हेतु से प्रत्याहार को अपने काम मे नही लाता हैं।

तत: परमा वष्यतेन्द्रियाणाम् ।। (यो०सू० 2/55)
महर्षि पतंजलि जी ने प्रत्याहार क्या है ये समझते हुए साधन पाद के अंतिम श्लोक में कहा है कि प्रत्याहार सिद्ध हो जाने के बाद योगी की इन्द्रियाँ पूर्ण रूप से उसके वश में हो जाती है, उनकी स्वन्त्रता का अभाव हो जाता है।
प्रत्याहार सिद्ध हो जाने के बाद इन्द्रिय को जीतने के लिए अन्य साधन की जरूरत नही रहती।

Thursday, September 6, 2018

paranayama different types | प्राणायाम के प्रकार अष्टांगयोग मे |

Paranayama different types

  अष्टांगयोग मे योग की चर्चा करते हुए हमने अध्यन किया यम, नियम, आसान के बारे में अब हम अष्टांग योग के चौथे अंग प्राणायाम के परिचय पर चर्चा करेंगे।
प्राणायाम के अभ्यास से चित्त को नियंत्रित किया जा सकता है, जैसा कि हठ प्रदीपिका मे भी कहा गया है ।

चले वाते चलं चित्तं निश्चले निश्चलं भवेत् ।
योगी स्थाणुत्वमाप्नोति ततो वायुं निरोधयेत् ।। हठ प्र. 2/2
अर्थ:--
प्राणवायु के चलने से चित्त चलायमान होता है और जब प्राण वायु रुकती है तो वो भी रुक जाती है या एकाग्र हो जाती है। सिद्ध योग इसी प्राण के नियमन पर नियंत्रण में कर के समाधि की स्थिति को प्राप्त कर लेते है।
महर्षि पतंजलि ने प्राणायाम का वर्णन करते हुए कहा हैं।

तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायाम: ।  (यो० सू० 2/41)
अर्थ:--
उसके बाद अथार्त आसन के सिद्ध हो जाने के बाद श्वास-प्रश्वास की गति का विच्छेद करना या होना प्राणायाम कहलाता है। सिद्ध योगियों का मत है कि आसन के सिद्ध हो जाने के बाद ही प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए अन्यथा प्राणायाम सिद्ध नही हो सकता क्योंकि इसके लिए शरीर का स्थिर होना अति आवश्यक माना गया है।

   
प्राणायाम के प्रकार अष्टांगयोग मे
प्राणायाम के प्रकार अष्टांगयोग मे



प्राणायाम का अर्थ:--
प्राणायाम शब्द, प्राण और आयाम दो शब्दों से मिलकर बना है, इसमे प्राण जीवनी शक्ति है और आयाम उस मे ठहराव है। हम निरंतर श्वास प्रसवास करते रहते है यह एक अनैच्छिक प्रक्रिया है तथा इसी क्रिया को नियंत्रित करके ऐच्छिक बना लेना व श्वास का पूरक करके कुम्भक करना और फिर इच्छानुसार रेचक करना प्राणायाम होता है।


  प्राण शब्द का अर्थ जीवनी शक्ति से भी लगाया जाता है, प्राण का स्थान हृदय माना गया है, जब हम श्वास लेते है तब वायु हमारे नासा छिद्रों से होकर फेफड़ो तक जाता है।

योग मे प्राणों को भी पाँच भागो मे बाटा है।
1. प्राण
2. अपान
3. समान
4. उदान
5. व्यान

ये पाँच मुख्य प्राण है तथा इनके भी पाँच उप प्राण है,
१. नाग
२.कूर्म
३. कृकल
४. देवदत्त
५. धनंजय
प्राणायाम को विस्तार से समझने के लिए इनके भेदों को भी समझना आवश्यक होता है।
ये तीन प्रकार के होते है।

बाह्याभ्यंतरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः परिदृष्टोदीर्घसूक्ष्मः ।।  ( यो० सू० 2/50)

उक्त सूत्र में तीन प्रकार के प्राणायाम का वर्णन किया गया है।
बाह्यवृति, आभ्यंतरवृत्ति, स्तम्भवृत्ति |
इन तीनो प्रकारों में श्वास को सरलता से जितने समय तक हो सके भीतर, बाहर तथा स्वाभिकावस्था मे रोक देना बताया गया है। इन तीन प्राणायाम के अतिरिक्त एक चौथा प्राणायाम भी है।

बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः ।
इस सूत्र को सरलता से समझना हो तो ऐसा कह सकते है कि यह अपने आप होने वाला एक प्रकार का राजयोग का प्राणायाम है। मन की चंचलता शांत होने के कारण श्वासों की गति आपने आप रुकती है, इसमे तनिक मात्र भी जोर नही दिया जाता कि श्वास लेने है या छोड़ना है या किसी भी स्थिति में रोक लेना है यह स्वयं ही किसी भी अवस्था मे स्वयं लगने वाला प्राणायाम है।
जब व्यक्ति के भीतर और बाहर के विषयों के चिंतन का त्याग हो जाता है तब यह प्राणायाम स्वयं ही लगने लगता है।
पतंजलि जी ने प्राणायाम के वर्णन यही समाप्त किया है और साथ मे (2/53) वे श्लोक में ये भी कहा कि प्राणायाम के अभ्यास से मन मे धारणा की स्थिति आने की योग्यता भी प्राप्त हो जाती है, अर्थात योगी कही भी अपने मन को अनायास ही स्थिर कर लेता हैं। यही प्राणायाम के लाभ है।
अर्थ:--
प्राणवायु के चलने से चित्त चलायमान होता है और जब प्राण वायु रुकती है तो वो भी रुक जाती है या एकाग्र हो जाती है। सिद्ध योग इसी प्राण के नियमन पर नियंत्रण में कर के समाधि की स्थिति को प्राप्त कर लेते है।
महर्षि पतंजलि ने प्राणायाम का वर्णन करते हुए कहा हैं।

तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायाम: ।  (यो० सू० 2/41)
अर्थ:--
उसके बाद अथार्त आसन के सिद्ध हो जाने के बाद श्वास-प्रश्वास की गति का विच्छेद करना या होना प्राणायाम कहलाता है। सिद्ध योगियों का मत है कि आसन के सिद्ध हो जाने के बाद ही प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए अन्यथा प्राणायाम सिद्ध नही हो सकता क्योंकि इसके लिए शरीर का स्थिर होना अति आवश्यक माना गया है।

प्राणायाम का अर्थ:--
प्राणायाम शब्द, प्राण और आयाम दो शब्दों से मिलकर बना है, इसमे प्राण जीवनी शक्ति है और आयाम उस मे ठहराव है। हम निरंतर श्वास प्रसवास करते रहते है यह एक अनैच्छिक प्रक्रिया है तथा इसी क्रिया को नियंत्रित करके ऐच्छिक बना लेना व श्वास का पूरक करके कुम्भक करना और फिर इच्छानुसार रेचक करना प्राणायाम होता है।

  प्राण शब्द का अर्थ जीवनी शक्ति से भी लगाया जाता है, प्राण का स्थान हृदय माना गया है, जब हम श्वास लेते है तब वायु हमारे नासा छिद्रों से होकर फेफड़ो तक जाता है।
योग मे प्राणों को भी पाँच भागो मे बाटा है।
1. प्राण
2. अपान
3. समान
4. उदान
5. व्यान
ये पाँच मुख्य प्राण है तथा इनके भी पाँच उप प्राण है,
१. नाग
२.कूर्म
३. कृकल
४. देवदत्त
५. धनंजय

प्राणायाम को विस्तार से समझने के लिए इनके भेदों को भी समझना आवश्यक होता है।
ये तीन प्रकार के होते है।

बाह्याभ्यंतरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः परिदृष्टोदीर्घसूक्ष्मः ।।  ( यो० सू० 2/50)
उक्त सूत्र में तीन प्रकार के प्राणायाम का वर्णन किया गया है।
बाह्यवृति, आभ्यंतरवृत्ति, स्तम्भवृत्ति |
इन तीनो प्रकारों में श्वास को सरलता से जितने समय तक हो सके भीतर, बाहर तथा स्वाभिकावस्था मे रोक देना बताया गया है। इन तीन प्राणायाम के अतिरिक्त एक चौथा प्राणायाम भी है।

बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः ।। (यो०सू० 2/51)
इस सूत्र को सरलता से समझना हो तो ऐसा कह सकते है कि यह अपने आप होने वाला एक प्रकार का राजयोग का प्राणायाम है। मन की चंचलता शांत होने के कारण श्वासों की गति आपने आप रुकती है, इसमे तनिक मात्र भी जोर नही दिया जाता कि श्वास लेने है या छोड़ना है या किसी भी स्थिति में रोक लेना है यह स्वयं ही किसी भी अवस्था मे स्वयं लगने वाला प्राणायाम है।
जब व्यक्ति के भीतर और बाहर के विषयों के चिंतन का त्याग हो जाता है तब यह प्राणायाम स्वयं ही लगने लगता है।
पतंजलि जी ने प्राणायाम के वर्णन यही समाप्त किया है और साथ मे (2/53) वे श्लोक में ये भी कहा कि प्राणायाम के अभ्यास से मन मे धारणा की स्थिति आने की योग्यता भी प्राप्त हो जाती है, अर्थात योगी कही भी अपने मन को अनायास ही स्थिर कर लेता हैं। यही प्राणायाम के लाभ है।

Wednesday, September 5, 2018

यूजीसी नेट 2018|UGC NET 2018 | NET exam by NTA

यूजीसी नेट 2018:


यूजीसी राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा के लिए पंजीकरण प्रक्रिया राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (एनटीए) की आधिकारिक वेबसाइट, भारत में उच्च शैक्षिक प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं के लिए प्राधिकृत नवगठित परीक्षा आयोजित करने वाली आधिकारिक वेबसाइट पर शुरू हुई है। उम्मीदवार जो इस साल दिसंबर में होने वाली परीक्षा के लिए बैठने में रूचि रखते हैं, वे आधिकारिक वेबसाइट ntanet.nic.in पर विवरण देख सकते हैं।
आप इस लिंक से सीधा फॉर्म भर सकते है:-


ऑनलाइन आवेदन पत्र भरने की आखिरी तारीख 30 सितंबर, 2018 है। इसके अलावा, यूजीसी-नेट की आधिकारिक वेबसाइट पर जारी अधिसूचना के अनुसार, परीक्षा कंप्यूटर आधारित (सीबीटी) प्रारूप में आयोजित की जाएगी। इसके अलावा, पिछले वर्षों के विपरीत एनईटी परीक्षा में तीन पत्रों के बजाय केवल दो पेपर होंगे, जो सीबीएसई या केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा आयोजित किए गए थे।


यूजीसी नेट 2018
यूजीसी नेट 2018

यूजीसी नेट दिसंबर 2018 के लिए ऑनलाइन आवेदन करने के लिए नीचे दिए गए चरणों का पालन करें:

1। एनटीए नेट 2018, ntanet.nic.in की आधिकारिक वेबसाइट पर जाएं
2। ऑनलाइन आवेदन पत्र भरें और सिस्टम जेनरेट किए गए एप्लिकेशन नंबर को नोट करें
3। जेपीजी / जेपीईजी प्रारूप में अभ्यर्थी के फोटो (10 केबी - 200 केबी के बीच) और अभ्यर्थी के हस्ताक्षर (4 केबी - 30 केबी के बीच) की स्कैन की गई छवियां अपलोड करें
4। नेट बैंकिंग का उपयोग करके आवेदन शुल्क भुगतान करें और भुगतान किए गए शुल्क का सबूत रखें
5। शुल्क के सफल प्रेषण के बाद पुष्टिकरण पृष्ठ के कम से कम चार प्रिंटआउट प्रिंट करें
इस बीच, आधिकारिक अधिसूचना यह भी इंगित करती है कि आवेदन पत्र के विवरण में सुधार 8 अक्टूबर, 2018 से 14 अक्टूबर, 2018 तक वेबसाइट पर खुलेगा। अभ्यर्थी एनटीए के यूजीसी नेट दिसंबर 2018 परीक्षा के लिए प्रवेश पत्र डाउनलोड करने में सक्षम होंगे। वेबसाइट 1 9 नवंबर, 2018 से शुरू हो रही है।
शुल्क का विवरण:--

General:-- 800 रुपये।
OBC:-- 400 रुपये।
SC/ST/PwD:-- 200 रुपये।

Sunday, September 2, 2018

अष्टांगयोग का तीसरा अंग आसन |

अष्टांगयोग का तीसरा अंग आसन

महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र के अष्टांग योग में योग के आठ अङ्गों का वर्णन करते हुए योग को विस्तृत रूप में वर्णन किया है। पहले के पोस्ट पढ़ने के लिए  इन पोस्ट को पढ़े।
अब यहां आसन के बारे में सूक्ष्म एवम संक्षेप वर्णन दे रहे है। यह संस्कृत के अस धातु से बना है, इसके दो अर्थ होते है । 1.  बैठने का स्थान, सीट। 

2.  शारीरिक अवस्था।
स्थिरसुखमासनम् ।  ।।यो.सू. 2/४६।।
इस सूत्र में बताया गया है कि किसी भी अवस्था मे सुख पूर्वक निश्चल बैठने का नाम आसन हैं।
योग कहता है कि किसी भी आसान मे बहुत लंबे  समय तक स्थिरता से बैठे रहना आसन सिद्धि का लक्षण है।
हठयोग में आसनों के बहुत सारे तरीके बताए गए हैं, लेकिन महर्षि पतंजलि ने इस सूत्र में कहां है कि जिस भी अवस्था मे आप सुख पूर्वक बैठ सको वो आसन हैं।
यानि साधक को कैसे बैठना है इस बात के लिए पतंजलि जी ने जोर नही दिया है उन्होंने ये साधक के ऊपर छोड़ दिया है,  शायद वे चाहते होंगे योगी अपनी योग्यगत के अनुसार बिना हिले डुले एक अवस्था मे सुख से लंबे समय तक बैठ सके वही उसके लिए सबसे अच्छा आसन होगा।

श्रीमद्भागवत गीता के अध्याय 6 श्लोक 11-13 में---
श्रीमद्भागवत गीता में अष्टांग योग के तीसरे अंग आसन का वर्णन करते हुए कहाँ है कि योगी जिस आसन में बैठ कर अभ्यास करें व स्थिर व सीधा होना चाहिए, जबकि योगी की स्थिति का वर्णन करते हुए कहा है कि सिर, गर्दन, शरीर एक सीध में होने चाहिए यहां भी किसी विशेष आसन का वर्णन नही किया है।

अष्टांगयोग का तीसरा अंग आसन
अष्टांगयोग का तीसरा अंग आसन

घेरण्ड सहिंता:--
अष्टांगयोग के तीसरे अंग आसन का घेरणसहिंता में भी वर्णन मिलता है।

आसनानि समस्तानि------------ शुभम् ।। (घेरण्ड संहिता)
मतलब घेरण्ड ऋषि कहते है कि संसार मे जितने भी जंतु है, उतने ही संख्या आसनो की भी है। भगवान शिव जी ने चौरासी लाख आसन बताये है उसमें से चौरासी बहुत ही प्रमुख आसन है, परंतु इनमे भी बत्तीस ऐसे आसनो का वर्णन घेरण्ड ऋषि करते है जो कि स्थिर अवस्था मे बैठ कर किये जा सकते है।

                    आसान भेद
सिद्धं पद्मं तथा भद्रं मुक्तं वज्रं च स्वस्तिकम् ।
सिंहं च गोमुखं वीरं धनुरासनमेव च ।।3।।
मृतं गुप्तं तथा मात्स्यं मत्स्येन्द्रासनमेव च ।
गोरक्षं पश्चिमोत्तानमुत्कटं संकटं तथा  ।।4।।
मयूरं कुक्कुटं कूर्मं तथा चोत्तानकुर्मकम् ।
उत्तानमंडुकमं वृक्षं मण्डुकमं गरुडं वृषम्  ।।5।।
शलभं मकरं चोष्ट्रं भुजङ्गं योगमासनम् ।
द्वात्रिंशदासनान्येव मर्त्ये सिद्धिप्रदानि च  ।।6।।

                                              (घेरण्ड संहिता)
अर्थ:--
इस मृत्यु लोक में इन्ही आसनो के अभ्यास से सिद्धि प्राप्त हो सकती है।
(1) सिद्धासन, (2) पदमासन, (3) भद्रासन, (4) मुक्तासन, (5)वज्रासन, (6) स्वस्तिकासन, (7) सिंहासन, (8) गोमुखासन, (9) वीरासन, (10) धनुरासन, (11) मृतासन (शवासन), (12) गुप्तासन, (13) मत्स्यासन, (14) मत्स्येन्द्रासन, (15) गोरक्षासन, (16) पश्चिमोत्तानासन, (17) उत्कटासन, (18) संकटासन, (19) मयूरासन, (20) कुक्कुटासन, (21) कुर्मासन, (22) उत्तान कुर्मासन, (23) मण्डूकासन, (24) उत्तान मण्डूकासन, (25) वृक्षासन, (26) गरुड़ासन, (27) वृषासन, (28) शलभासन, (29) मकरासन, (30) उष्ट्रासन, (31) भुजंगासन, (32) योगासन। 

इन सभी आसनो को एक- एक करके विस्तार से अगली पोस्ट में बताएंगे।

हठ प्रदीपिका :--  हठ प्रदीपिका के लेखक गुरु गोरक्षनाथ के शिष्य स्वामी स्वात्माराम जी ने इस 15 प्रकार के आसन का वर्णन किया है जो निम्न प्रकार है।
(1) स्वस्तिकासन, (2) गोमुखासन, (3) वीरासन, (4) कुर्मासन, (5) कुक्कुटासन, (6) उत्तानकुर्मासन, (7) धनुरासन, (8) मत्स्येन्द्रासन, (9) पश्चिमोत्तानासन, (10) मयूरासन, (11) शवासन, (12) सिद्धासन, (13) पद्मासन, (14) सिंहासन, (15) भद्रासन  ।

शिवसंहिता:--
शिवसंहिता में संस्कृत भाषा मे योग के विषय मे वर्णन दिया गया है, माना जाता है कि स्वयं भगवान शिव ने माता पार्वती को योग के विषय से अवगत कराया था।