Wednesday, August 22, 2018

अनिद्रा रोग समस्या और समाधान|

अनिद्रा रोग समस्या और समाधान

अनिद्रा आजकल के आधुनिक समय मे बहुत तेजी से से अपने पैर पसार रहा है, इसका सबसे बड़ा कारण अनियमित रहन सहन है। तनाव अनिद्रा होने का सबसे बड़ा कारण है।

अनिद्रा रोग की समस्या लगभग सभी को हो जाती है आज कल तो को लोगो को रेगुलर नींद नही आती, पर अगर कभी कभी आप को  भी रात को नींद न आये तो भी आप भी अनिद्रा रोग से ग्रसित है।

दिमाग मे किसी बात की चिंता है तो आप को रात को नींद नही आती। अगर आप बहुत अधिक थके हुए है तो भी आप को नींद नही आएगी।
अगर काम को लेकर चिंता है, पैसा नही है सोचते रहेंगे तो भी नींद नही आती।
दिमाग मे सोने के समय चलने वाले किसी भी तरह के विचार नींद को आने से रोकते हैं।
रात को सोने के समय घर मे अनावश्यक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बन्द कर देना चहिये, ताकि इनसे निकलने वाली तरंगे दिमाग को परेशान न करें।
शारीरिक बीमारी के कारण भी नींद नही आती।

अनिद्रा रोग समस्या और समाधान
अनिद्रा रोग समस्या और समाधान

अनिद्रा की समस्या का कारण  उदासी, घबराहट या इन दोनों के संयुक्त प्रभाव



उपाय:--
आयुर्वेद के अनुसार पैर गर्म, पेट नरम, सिर ठंडा होने चाइये, अगर ऐसा न होबतो भी रात को ठीक से नींद नही आती।
1.  रात को सोने से काम से कम 3-4 घंटे पहले भोजन कर लें।
2.  दोनों हाथों की अनामिका अंगुली के टिप को दबाये।
3.  अनुलोम विलोम प्राणायाम करे बहुत हल्के हल्के बिना जोर लगाये लेट कर ही करें।( ये इतना धीरे होना चाइये की आप की नाक के आगे कोई धागा रखा हो तो वो भी न हिले।
4.  प्राणायाम सुबह शाम करना उचित होता है।
5.   चमेली या खस खस के तेल से हल्के हाथ से सिर की मालिश करे।

Monday, August 20, 2018

अष्टांगयोग का वर्णन योगदर्शन में|

अष्टांगयोग का वर्णन योगदर्शन में


योग एक अनमोल धरोहर जिसे इस संस्कृति और प्रकृति ने बड़े इफाजत से संभाल कर रखा हुआ है, योग का मुख्य उद्देश्य आत्मा का परमात्मा से मिलन माना गया है, या कहे  तो केवल्य की प्राप्ति मन गया है।  जिसके लिए योग में शारिरिक सुद्धि से लेकर मन बुद्धि की शुद्धि भी अनिवार्य है, परंतु कुछ लोग इन प्रारम्भिक अभ्यासों पर धयान न देकर सीधा ध्यान, समाधि के प्राप्ति का प्रयास करने लगते है तथा असफल हो जाते है।

  सरल भाषा मे ऐसे समझ जाएं कि जब कोई मकान बनाना हो तो उसके लिए नीव खोदी जाती है ताकि मकान का आधार मजबूत हो सके, यहां जो काम नींव का है मकान की मजबूती बनाने में वही काम यम, नियम का है ताकि योगाभ्यासी का चित्त शुद्ध हो सके और वो साधना मार्ग पर चल सके। हालाकि सभी आठो अंग महत्वपूर्ण है तथापि यम, नियम आती मत्वपूर्ण है, इससे चित्त के मल का आभाव होकर वह निर्मल हो जाता है अर्थात उसका आत्मा, बुद्धि, से प्रत्यक्ष दिखने लगता है।


अष्टांगयोग का वर्णन योगदर्शन में

महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र में तीन प्रकार के योग साधना का वर्णन किया है---
1.  प्रथम साधना--  उत्तम कोटि के साधकों के लिए हैं।(साधक सीधा ईश्वरप्रणिधान द्वारा भी समाधि की अवस्था को प्राप्त कर सकता है।)
2. द्वितीय साधना-- मध्यम कोटि के साधकों के लिए हैं।(साधक को तप, स्वाध्याय तथा ईश्वरप्रणिधान के माध्यम से क्लेशो को मिटाते हुए ईश्वर प्राप्ति का वर्णन क्रिया योग में है। 

सूत्र:-- तप स्वाध्यायेश्र्वप्राणिधानानि क्रियायोग यो.सू. 2/1)
3. तृतिया साधना-- सामान्य कोटि के साधकों के लिए हैं।(साधना की प्रथम अवस्था से आरम्भ कर आठो अंगों का पालन करते हुए चलना पड़ता है।)

महर्षि पतंजलि ने योग साधना के मार्ग पर चलने वाले के सामान्य कोटि के साधकों के  लिए अपने द्वितीय पाद (साधन पाद) के 29वें श्लोक में अष्टांग योग के आठों अंगों का वर्णन किया है। अष्टांगयोग का अर्थ है अष्ट अंग यानी की आठ अंगों का, मतलब हुआ योग के आठ अंगों का पालन करते हुए, शरीर मन, बुद्धि की शुद्धि करते हुए एकाग्र हो कर समाधि की अवस्था को प्राप्त करना।
सूत्र:--

यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमध्योSष्टावङ्गानि। यो.सू. ।।2/29।।
अर्थात:-- यम,नियम,आसान,प्राणायाम,प्रत्याहार,धारणा, ध्यान और समाधि ये आठ अंग है योग साधना के।
इसमे भी दो भेद बताये गए है।
1.  बहिरंग योग
2.  अंतरंग योग
1.  बहिरंग योग के अंतर्गत आने वाले 5 अंग
*     यम
*  नियम
*  आसन
* प्राणायाम
*  प्रत्याहार
2.   अंतरंग योग के अंतर्गत आने वाले 3 अंग
*   धारणा
*   ध्यान
*   समाधि।
अब यहां हम सबसे पहले थोड़ा बहिरंग योग और अंतरंग योग  को समझ लेते है।
1. बहिरंग का मतलब है बाहर की क्रियाएं क्योंकि इन पाँचों का संबंध बाहर की क्रियाओं से है।
2.  अंतरंग का मतलब हुआ अन्त:करण से होने वाली क्रियाए। इन तीनों क्रियाओ को  "संयम" भी कहा गया है।
("त्रयमेकत्र संयम:") यो.सू. 3/4
1.  बहिरंग
१..  यम
आहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमा: यो.सू. २/३०
सन्दर्भ ग्रंथ:-- पतंजलि योगदर्शन

Sunday, August 19, 2018

अष्टांगयोग-- 2

अष्टांगयोग
आहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमा: यो.सू. २/३०
विच्छेद:-- अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह।
ये पाँच यम है।

इस सूत्र में यम के पाँच भाग बताये गए जिनका पालन करना अति आयश्यक होता है।
व्याख्या:-- १.  अहिंसा:-- मानस, वाचा,कर्मणा (मन, वचन,कर्म) इन तीनो से किसी पर भी किसी भी प्रकार की हिंसा नही करनी चाहिए।

२.  सत्य:-- इन्द्रिय और मन से विचार कर देखकर, सुनकर हम जैसा अनुभव करते हैं वो बात किसी को ऐसे बोलना की उसे बुरा न लगे उसे ही सत्य कहते है।
३.  अस्तेय:-- किसी भी व्यक्ति से उसकी वस्तु बिना आज्ञा के ले लेना या उसके साथ धोखा कर के ले लेना अस्तेय कहलाता है।
४.   ब्रह्मचर्य:-- इन्द्रियों को वश में करके ब्रह्मचर्य की रक्षा करना किसी भी प्रकार के काम उद्दीपक चीजो को ग्रहण करना किसी भी प्रकार से गलत है, इन सब से बचते हुए वीर्य की रक्षा करना ब्रह्मचर्य कहलाता है।
५.   अपरिग्रह:-- मनुष्य के अन्दर जो संचय करने की प्रकृति होती है उसी को त्यागना अपरिग्रह कहलाता है।


अष्टांगयोग

2. नियम:--
                 यह एक प्रकार से आंतरिक अनुशासन है, जिस प्रकार यम, मनुष्य को सामाजिक बनाता है उसी प्रकार नियम, मनुष्य को आंतरिक रूप से सामाजिक बनाता हैं।
शौचसन्तोषतप: स्वाध्यायेश्वरप्राणिधानानि नियमा: ।।यो.सू.  2/32।।
विच्छेद:- शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, और ईश्वरप्रणिधान
ये पांच नियम हैं।
१.   शौच:--  जैसा कि सभी जानते शौच के अर्थ होता है शुद्धि करना, पवित्रता। अभक्ष्य, अपेय, का सेवन न करना, कुसंगतियो का संग ना करना, ये शौच है, शौच भी दो प्रकार के होते है। * बाह्य, * आंतरिक शौच।
बाह्य शौच -- साबुन शेम्पू पानी आदि से हम अपना शरीर/वस्त्र, तो साफ कर लेते है, अच्छे भोजन से आहार की पवित्रता आती हैं।
आंतरिक शौच-- आपने दुर्गुणों को त्याग देने से, जप, तप, दान आदि से अन्त:कारण की सुद्धि होती है।
२.   संतोष:--  जीवन मे सुख दुख, लाभ हानि, जय पराजय, आपने कर्मफल को स्विकार करना इन सब स्थितियों में सम भाव  से रहना संतोष कहलाता है।
३.   तप:-- आपने कर्म को निष्ठा से करते हुए अपनी योग्यता के अनुसार आपने काम को करना और उसमें जो भी शारीरिक व मानसिक कष्ट हो खुसी से स्वीकार करना तप हैं।
४.   स्वाध्याय:-- आचार्य विद्वानों आदि से वेद, उपनिषद, रुद्र सूक्त, और पुरुसूक्त आदि का अध्यन स्वाध्याय है, वैसे स्वयं का अध्यन करना भी स्वाध्याय कहलाता है।
५.   ईश्वरप्रणिधान:--  ईश्वर की भक्ति में ओर उपासना म् स्वयं को लीन कर देना ही ईश्वर प्रणिधान कहलाता हैं।

Friday, August 17, 2018

मोटापा काम करने के उपाय

मोटापा काम करने के उपाय


आधुनिकता की दौड़ में समय का अभाव, बढ़ती महँगाई में एक व्यक्ति की नोकरी से घर का पालन पोषण न हो पाना एक आम बात हो गयी है परन्तु ये आम बात एक ऐसे रोग को निमंत्रण देता है जो स्वयं रोग न होकर भी अनेको रोगों को आमंत्रित करता है, इसे मोटापा कहते है।
मोटापा वैसे तो कोई रोग नही है, परंतु जब ये आवश्यकता से अधिक बढ़ जाता है तो इसके कारण कई सारे रोग लग जाते है जैसे ("हाई ब्लड प्रेशर, मधुमेह, थाइरोइड, हार्ट ब्लॉकेज, अपच, शारीरिक ऊर्जा की कमी") आदि रोग लग जाते है।


मोटापा काम करने के उपाय


जब शरीर मे खाल म् कसावट काम हो जाये या ये ढीली पड़ने लगे तो समझ जाइये की या तो मोटापा बढ़ गया है या आप बूढ़े हो रहे हैं। शरीर की चमड़ी के नीचे जब वसा जमने लगे और शरीर स्थूल होने लगे तो यह "मोटापा" कहलाता है।
मोटापा किसी भी रूप में अच्छा नही मन जा सकता, क्योंकि ये रोगों का जनक होने के साथ व्यक्ति की क्रिया शीलता काम कर देता हैं। अधिक चिकनाई युक्त भोजन, जंक फूड, मिठाईयां, चावल, आलू, मैदा आदि से मोटापा बढ़ता है, शारीरिक व्यायाम की कमी, शरीर मे अक्रियाशीलता के बढ़ने से भी यह बढ़ता है।

लक्षण:--
*  शरीर मे सुस्ती बढ़ना।
*  गहरी साँस लेना या साँस लेने में तकलीफ होना।
*  थोड़ी मेहनत करने पर ही थक जाना।
*  उठने बैठने में तकलीफ होना।
*  मन सदैव उदास रहता है।
*  कार्यक्षमता में कमी आ जाती है।

योगिक चिकित्सा:--
  वजन कम करने के लिए बहुत से योगासन है जिनकी सहायता से वजन आसानी से घटाया जा सकता है। जैसे:-
पवनमुक्तासन, चक्किचालन, उत्तानपादआसान, सर्वांगासन, मत्स्यासन, हलासन, पश्चिमोत्तानासन, भुजंगासन, अर्धशलभासन, अर्धमत्स्येन्द्रासन, कोणासन, ऐसे कई आसान है जो वजन कम करने में सहायक हैं।
प्राणायाम में नाड़ी शोधन, भ्रामरी, सूर्यभेदन, भस्त्रिका बहुत उपयोगी होंगे, साथ मे तड़ागी मुद्रा, महामुद्रा और उड्डीयानबन्ध भी लाभकारी होता है।
जलनेति, वस्त्रधोती, कुंजलक्रिया, नौलि, कपालभाति, अग्निसार, बस्ति, शंखप्रक्षालन।

आहार:--
*   हरी पत्तेदार सब्जियां, फल, सलाद।
*   बिना तेल मसले का भोजन।
*   भोजन का समय निश्चित रखें।
*   जंक फूड, पिज़्जा, बर्गर को न कहें।
*   चीनी से बनी मिठाईया व आइसक्रीम से बचें।
*   मख्खन, क्रीम, पेस्ट्री, केक न खाएं।

अन्य जरूरी बातें:--
*   सुबह खाली पेट गर्म पानी मे निम्बू व शहद मिला कर     पिये।
*   रात में सोते समय त्रिफला चूर्ण का सेवन कर के सोये।
*   आँवला भी शरीर का वजन संतुलित करता है।
*   भोजन में हरीमिर्च को शामिल करें।
*   मेथी के दानों का एक चम्मच चूर्ण नियमित रूप से सेवन करें।
*   अपनी बार बार खाते रहने की आदत को बदले।
*   सबसे जरूरी है सुबह शाम या तो दौड़ लगाया जाए या तेज गति से चला जाये।

विशेष आग्रह:--
   इस जानकारी को देने में सारी सावधानी का खयाल रखा गया है परंतु फिर भी यह पोस्ट आप के ज्ञान को बढ़ाने मात्र के लिए लिखी गयी है, आप से निवेदन है कि किसी भी प्रयोग को करने से पहले किसी कुशल डॉक्टर से सलाह अवश्य ले लें।
     धन्यवाद।

हाई ब्लड प्रेशर(उच्च रक्तचाप) के उपचार

हाई ब्लड प्रेशर(उच्च रक्तचाप) के उपचार


उच्च रक्तचाप एक प्रकार का लक्षण है जो कि हृदय, गुर्दे या रक्त संचार प्रणाली में गड़बड़ होने के कारण होती है,इसलिए इसे रोग कहना उचित है या नही ये आप खुद विचार करिए।
इस रोग का कोई समय या उम्र नही होती यह किसी भी आयु के व्यक्ति को होने लगी है। यह रोग अनुवांशिक लक्षणों के कारण भी हो सकता है। यह रोग उन सभी को होने का लगभग निश्चित समझना चाहिए जिसके जीवन मे तनाव होता है।
जो लोग अधिकतर क्रोध, दुःख, भय जैसे भावनाओ से घिरे रहते है उनको रक्तचाप जल्दी हो जाता है।  धूम्रपान, नशा, थकान, अधिक मानसिक परिश्रम या परिश्रम की कमी, फास्टफूड, अधिक वसायुक्त भोजन, मधुमेह, गठिया सुजाक, कब्ज आदि रोगों के कारण भी उच्च रक्तचाप हो जाता है।

हाई ब्लड प्रेशर(उच्च रक्तचाप) के उपचार
हाई ब्लड प्रेशर(उच्च रक्तचाप) के उपचार

लक्षण:--
*  शुरू में सिरदर्द होता है, चक्कर आना, धड़कने तेज होना, सिर में भारीपन होना आदि।
*  आलस्य, काम मे मन न लगना, उल्टी होना।
*  जी घबराना, अत्यधिक बैचैनी, पाचन में गड़बड़ी।
*  आँखों के आगे अंधेरा आना, नींद न आना, आदि इसी रोग के लक्षण है।
*  जब यह रोग बढ़ जाता है तो नाक से खून आने लगता है, हृदय में दर्द होने लगता है, हाथ-पैर सुन्न हो जाते है।

निदान:--
1. पपीते का रस पीने से रक्तचाप नियंत्रित होता है।
2. एक चम्मच प्याज के रस में दो चम्मच शहद मिला कर पीना चाहिए।
3.  तीन सेब सुबह व एक सेब शाम को खाना चाइये।
4.  रोज सुबह लौकी का रस पीने से भी लाभ मिलता है।

अन्य उपाय:--
1.  सदा व आसानी से पचने वाला भोजन करना चाहिए।
2.   समुद्री नमक का प्रयोग न के बराबर करे हो सके तो सेंधा नमक प्रयोग करें।
3.  क्रोध, चिंता, तनाव, से जितना हो सके दूर रहें।
4.  सप्त में एक दिन फलाहार या उपवास में रहे।
5.  व्यायाम अवश्य करें।

योग:--
*  अनुलोमविलोम, उज्जायी, भ्रामरी, उद्गीत, शीतली शीतकारी प्राणायाम का अभ्यास करें।
*  पवनमुक्तासन, वज्रासन, मकरासन उपयोगी आसान।
*  कुंजल, नौलि, कपालभाति, नेति,।
*  ॐ का उच्चारण कर उसी ध्वनि में ध्यान करे।

नोट:--
उपरोक्त सभी जानकारी आपके ज्ञानार्जन के लिए है, किसीभी प्रकार की कोई समस्या होती हो तो किसी कुशल वैध से परामर्श अवश्य ले स्वयं वैध न बनें ।
धन्यवाद।

Thursday, August 16, 2018

What is Migraine? | माइग्रेन (समस्या,समाधान)

What is Migraine? 


आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में आराम का आभाव, तनाव, अवसाद जैसे कारणों से माइग्रेन रोग होता है। माइग्रेन के दर्द बहुत ही पीड़ा देने वाला दर्द होता है, यह आधे सिर में होता है और फैलता हुआ मुँह में जबड़ो तक जाता है। यह समस्या अधिकतर महिलाओ में ज्यादा देखने को मिलता है।

Migraine, माइग्रेन दर्द,
माइग्रेन का दर्द


पहचान/लक्षण:--

  दृष्टि सम्बन्धी परेशानी जैसे रुक-रुक कर तेज़ रोशनी दिखना, टेढ़ी मेढ़ी रेखाएं दिखना, काले धब्बे दिखना, जी मचलना, उल्टी होना, घुस्सा, त्वचा में चुभन महसूस होना, निम्न रक्तचाप, तेज आवाज से परेशानी, चिड़चड़ापन।
माइग्रेन के दर्द सूर्य के उदय होने के साथ बढ़ता है और सूर्य तो अस्त होते-होते ये भी खत्म हो जाता हैं।

कारण:--

मेडिकल साइन्स के अनुसार जाने तो सिर में खून की नली के फैल जाने से, नर्व फाइबर पर दबाब पड़ता है जिससे केमिकल रिलीस होता है इसके कारण ब्लड नलियो मे सूजन, दर्द का फैलाव होने लगता है, इसमे बहुत तेज दर्द होता है।

अन्य कारण:--

एलर्जी, तेज रोशनी, तेज सुगंध, तेज आवाज, धुंआ, सोने व उठने का गलत समय, बर्थ कन्ट्रोल पिल्स, अनियमित माहवारी, एल्कोहल आदि।

दवाई, दर्द की दवा
Pils
इलाज:--
* तापमान के तेज बदलाव से बचें, सूर्य की एज़ रोशनी से बचें।
*  पानी के सेवन भरपूर करें।
*  सुबह, शाम सैर पर जाएं।
*  भोजन में ओमेगा3, फैटी एसिड को शामिल करें।
*  मैगनीशियम को भोजन में शामिल करें ।
*  सूप, निम्बू पानी, नारियल पानी, जूस, लस्सी का सेवन करे।
*  इसपैक से 10-15मि. सेके।
*  तिल के तेल में एक टुकड़ा दालचीनी, 2 इलाइची, डाल कर गरम करें व सिर की मालिश करें।
*  अदरक का सेवन करें।
*  10-15 मि. अनुलोम विलोम का अभयास करें।
*  3-5 बार भ्रामरी व उद्गीत प्राणायाम का अभयास करे।
*  पित्त से होने वाले सिरदर्द में सुबह खाली पेट गुनगुना  पानी पीकर उल्टी करें।
*  भोजन में चुकंदर, पत्ता गोभी, ककड़ी, गाजर का रस, नारियल पानी, मेथी, बथुआ, अंजीर, आंवला, निम्बू, अनार, सेब संतरा आदि शामिल करे।

परहेज:--
*  एल्कोहल व मांशाहार से दूर रहें।
*  देर से भोजन न करें।
*  मसालेदार भोजन व फ़ास्ट फ़ूड से बचें।
नोट:--
उक्त जानकारी सामान्य ज्ञान के लिए है रोगी डॉक्टर से सलाह ले कर ही उक्त विधि को अपनाएं।

Tuesday, August 14, 2018

पतंजलि योगदर्शन

पतंजलि योगदर्शन

भारतीय दर्शन के अनुसार 9 दर्शन बताये गए है, जिनमे 6 आस्तिक व 3 नास्तिक दर्शन है।
इन आस्तिक दर्शनो म् सबसे प्रमुख महर्षि पतंजलि का योगसूत्र या योग दर्शन आता है।
महर्षि पतंजलि जी का जन्म लगभग 2 सदी ईसा पूर्व (2200 वर्ष पूर्व)/ भगवान बुद्ध के समकालीन मन जाता है। ये भी प्रख्यात है कि महर्षि पतंजलि शेषनाग के अवतार पुरुष थे।
पतंजलि ने योगसूत्र के अतिरिक्त पाणिनि व्याकरण, और आयुर्वेद का महान ग्रंथ चरक सहिंता लिखी थी।
महर्षि पतंजलि के योगदर्शन के कारण ही योग जान मानस के लिए सुलभ व सरल हो पाया है, अनयथा पहले तो योग का अभ्यास सम्प्रदायों और गुरु शिष्य परंपरा में ही बांध रह गया था।


पतंजलि योगदर्शन
पतंजलि योगदर्शन

समाधिपाद----1

अथ योगनुशासनम् ।। 1 ।।

व्याख्या:--
इस प्रथम श्लोक में ऋषि पतंजलि ने कहा है कि योग का प्रारंभ अनुशासन के साथ किया जाना चाहिये।
इस श्लोक में  योग के शास्त्र को प्रारंभ करने को ऋषि पतंजलि के रहे है।
अथ का तात्पर्य यहाँ अब प्रारम्भ करने से लिया गया है, पतंजलि जी कहते है अब योग का अनुशासन प्रारम्भ करते है।

योगश्चित्तवृतिनिरोध: ।। 2 ।।

चित्त की वृत्तियों का निरुद्ध हो जाना योग है।
अथार्त:--

यह सूत्र बहुत ही महत्वपूर्ण है, इसी सूत्र में बताया गया है कि चित्त की जो वृत्तियां जो होती है उन का निरोध हो जाना/रुक जाना ही योग है

Sunday, August 12, 2018

योग एक संक्षिप्त परिचय --- 2

योग एक संक्षिप्त परिचय --- 2

 *  योग जीवन जीने की कला सिखाता है।
*  योग एवं शारीरिक व्यायाम का मुख्य अंतर यही है कि योग का अभ्यास प्राण धारणा के साथ करना चाहिए।
तनाव, थकान होने पर योग अभ्यास करने से तुरंत लाभ मिलता है।
*  लंबे समय तक डिजिटल स्क्रीन पर देखते रहने से आंखों व मानसिक तनाव में भी योग तुरंत राहत पहुँचता है।


योग एक संक्षिप्त परिचय 


*  आधुनिक चिकित्सा पद्धति यह शोध कर रही है कि H.I.V. रोग की चिकित्सा में योग की क्या भूमिका हो सकती है, और पूरी आशा है कि परिणाम सार्थक होंगे।
*  योग से विद्यार्थियों के मस्तिष्क का विकास सामान्य बच्चो की अपेक्षा अधिक अच्छा होता हैं।
*  योग, ध्यान के अभ्यास द्वारा बच्चो की स्मरण शक्ति, एकाग्रता पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
*  शिक्षा के क्षेत्र में योग के बढ़ते प्रचलन का अन्य कारण इसका नैतिक जीवन पर सकारात्मक प्रभाव है, आजकल बच्चों में गिरते नैतिक मूल्यों को फिर से स्थापित करने के लिए योग का सहारा लिया जाता है।
  विश्व भर के विद्वानों ने इस बात को मन है कि योग के अभयास से शारीरिक व मानसिक ही नही बल्कि नैतिक विकास भी होता है। इसी कारण से आज कल सभी सरकारी व गैर सरकारी शिक्षण संस्थानों पर योग को अनिवार्य विषय के रूप में लागू किया जा रहा हैं।
    अतः आप सभी से विन्रम निवेदन है कि आप सब भी योग को अपनाए व अपने साथियों को भी योग के लिए प्रेरित करें।
                                                                                धन्यवाद
                                                                                                                                  योगिशिव

introduction of yoga | योग एक संक्षिप्त परिचय ---1 |

                              भूमिका

                             *********

योग आदिकाल के गर्भ में सुप्त कोई कहानी नही है, यह वर्तमान की सर्वाधिक कीमती विरासत है। यह वर्तमान समय की सबसे महत्वपूर्ण ओर भविष्य की संस्कृति है।
                            ---- स्वामी सत्यानन्द सरस्वती

योग का अर्थ---- introduction of yoga

  योग शब्द का अर्थ होता है एकत्व या जोड़ना यह संस्कृत के धातु युज् से बना है। महर्षि पाणिनी ने योग शब्द की वियुत्पत्ति "यूजिर योगे", "युज् समाधौ" और "युज् संयमने" इन तीन धातुओं से मानी गयी है। प्रथम वियुतपत्ति का अर्थ जोड़ना, मिलाना, मेल आदि इसीलिए योग को आत्मा का परमात्मा से मिलान योग कहलाता है।
इसी संयोग की स्थिति को समाधि की संज्ञा दी गयी है।
महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र में परिभाषित करते हुए कहा है----
"योगश्चित्तवृतिनिरोध:" यो.सू. 1/2
अर्थात चित्त की वृत्तियों का निरोध करना ही योग है। यहां चित्त का तात्पर्य अंतःकरण से है।
तदा द्रष्टु:सरूपेSवस्थानम्।। यो.सू. 1/3
योग की स्थिति में साधक (पुरुष) की चित्तवृत्ति निरुद्धकाल में कैवल्य अवस्था की भांति चेतन मात्रा (परमात्मा) स्वरूप में स्थित होता है।

introduction of yoga
introduction of yoga

इतिहास----

योग का इतिहास आदिकाल के समय से भी पुराण है। इसका वर्णन वेदों एवम पुराण में देखने को मिलता है, ऐसा माना जाता है कि योग का परिचय सर्वप्रथम भगवान शिव ने माता पार्वती को यह ज्ञान दिया था।
प्राचीन काल मे योग के ज्ञान को गुप्त रखा जाता था, उन्हें न तो लिपिबद्ध किया जाता था और न ही खुले रूप में सिखाया जाता था, उस काल मे यह ज्ञान गुरु शिष्य परम्परा के रूप में ही चलता था। सिंधु घाटी सभ्यता में योग का विस्तृत वर्णन तो नही मिलता पर योग के आसन प्रतीक के रूप में दिखते है।
महर्षि पतंजलि ने राजयोग पर प्रतिपादित योगसूत्र म् एक निश्चित योग विद्या का वर्णन किया जिसे अष्टांगयोग के नाम से जाना जाता है। अष्टांगयोग के अंतर्गत यम, नियम, आसान, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि आते है।
ईशा पूर्व छठी सदी में भगवान बुद्ध ने ध्यान और सामाजिक आचरण को प्रमुखता दी, परंतु योगी मत्सयेन्द्रनाथ ने कहा कि ध्यान के अभ्यास से पहले शरीर और उसके तत्वों की शुद्धि अति आवश्यक है। इनके नाम पर एक आसान का नाम मत्स्येन्द्रासन नाम पड़ा।
इनके शिष्य ने हठयोग पर स्थानीय भाषा मे पुस्तके लिखी और योग को जान मानस तक पहुँचाया।
हठयोग के ज्ञाता स्वामी  स्वात्माराम ने "हठयोग प्रदीपिका" संस्कृत में लिखी।
आज के समय में योग की प्रासंगिकता --------
आज की 21वी. सदी में योग हमें अमूल्य विरासत के रूप में मिली हैं।  वैसे तो योग का प्रथम उदेश्य प्राणिमात्र को आधयात्मिक मार्ग के उच्चत्तम शिखर तक पहुँचना है, फिर भी योग के अभ्यास से सभी को प्रत्यक्ष रूप से लाभ अवश्य ही प्राप्त हुआ है।
योग की सबसे बड़ी उपलब्धि शरीरिक एवं आधयात्मिक रूप में लाभ देना है। योग दमा, मधुमेह, गठिया, रक्तचाप, जॉइन्ट पेन, पाचन संबंधी समस्या मे योग को वैकल्पिक चिकित्सा के रूप में सर्वाधिक प्रयोग किया जाता है। शेष आगे---योग एक संक्षिप्त परिचय --- 2