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अष्टांगयोग का वर्णन योगदर्शन में|

अष्टांगयोग का वर्णन योगदर्शन में


योग एक अनमोल धरोहर जिसे इस संस्कृति और प्रकृति ने बड़े इफाजत से संभाल कर रखा हुआ है, योग का मुख्य उद्देश्य आत्मा का परमात्मा से मिलन माना गया है, या कहे  तो केवल्य की प्राप्ति मन गया है।  जिसके लिए योग में शारिरिक सुद्धि से लेकर मन बुद्धि की शुद्धि भी अनिवार्य है, परंतु कुछ लोग इन प्रारम्भिक अभ्यासों पर धयान न देकर सीधा ध्यान, समाधि के प्राप्ति का प्रयास करने लगते है तथा असफल हो जाते है।

  सरल भाषा मे ऐसे समझ जाएं कि जब कोई मकान बनाना हो तो उसके लिए नीव खोदी जाती है ताकि मकान का आधार मजबूत हो सके, यहां जो काम नींव का है मकान की मजबूती बनाने में वही काम यम, नियम का है ताकि योगाभ्यासी का चित्त शुद्ध हो सके और वो साधना मार्ग पर चल सके। हालाकि सभी आठो अंग महत्वपूर्ण है तथापि यम, नियम आती मत्वपूर्ण है, इससे चित्त के मल का आभाव होकर वह निर्मल हो जाता है अर्थात उसका आत्मा, बुद्धि, से प्रत्यक्ष दिखने लगता है।


अष्टांगयोग का वर्णन योगदर्शन में

महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र में तीन प्रकार के योग साधना का वर्णन किया है---
1.  प्रथम साधना--  उत्तम कोटि के साधकों के लिए हैं।(साधक सीधा ईश्वरप्रणिधान द्वारा भी समाधि की अवस्था को प्राप्त कर सकता है।)
2. द्वितीय साधना-- मध्यम कोटि के साधकों के लिए हैं।(साधक को तप, स्वाध्याय तथा ईश्वरप्रणिधान के माध्यम से क्लेशो को मिटाते हुए ईश्वर प्राप्ति का वर्णन क्रिया योग में है। 

सूत्र:-- तप स्वाध्यायेश्र्वप्राणिधानानि क्रियायोग यो.सू. 2/1)
3. तृतिया साधना-- सामान्य कोटि के साधकों के लिए हैं।(साधना की प्रथम अवस्था से आरम्भ कर आठो अंगों का पालन करते हुए चलना पड़ता है।)

महर्षि पतंजलि ने योग साधना के मार्ग पर चलने वाले के सामान्य कोटि के साधकों के  लिए अपने द्वितीय पाद (साधन पाद) के 29वें श्लोक में अष्टांग योग के आठों अंगों का वर्णन किया है। अष्टांगयोग का अर्थ है अष्ट अंग यानी की आठ अंगों का, मतलब हुआ योग के आठ अंगों का पालन करते हुए, शरीर मन, बुद्धि की शुद्धि करते हुए एकाग्र हो कर समाधि की अवस्था को प्राप्त करना।
सूत्र:--

यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमध्योSष्टावङ्गानि। यो.सू. ।।2/29।।
अर्थात:-- यम,नियम,आसान,प्राणायाम,प्रत्याहार,धारणा, ध्यान और समाधि ये आठ अंग है योग साधना के।
इसमे भी दो भेद बताये गए है।
1.  बहिरंग योग
2.  अंतरंग योग
1.  बहिरंग योग के अंतर्गत आने वाले 5 अंग
*     यम
*  नियम
*  आसन
* प्राणायाम
*  प्रत्याहार
2.   अंतरंग योग के अंतर्गत आने वाले 3 अंग
*   धारणा
*   ध्यान
*   समाधि।
अब यहां हम सबसे पहले थोड़ा बहिरंग योग और अंतरंग योग  को समझ लेते है।
1. बहिरंग का मतलब है बाहर की क्रियाएं क्योंकि इन पाँचों का संबंध बाहर की क्रियाओं से है।
2.  अंतरंग का मतलब हुआ अन्त:करण से होने वाली क्रियाए। इन तीनों क्रियाओ को  "संयम" भी कहा गया है।
("त्रयमेकत्र संयम:") यो.सू. 3/4
1.  बहिरंग
१..  यम
आहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमा: यो.सू. २/३०
सन्दर्भ ग्रंथ:-- पतंजलि योगदर्शन

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