Tuesday, September 11, 2018

What is Pratyahara | प्रत्याहार क्या हैं??

Pratyahara| प्रत्याहार:--

प्रत्याहार पतंजलि कृत योगसूत्र के अनुसार योग के पांचवें अंग के रूप में आता है।

प्रत्याहार क्या है :-
प्रत्याहार का अर्थ होता है बाह्यवृत्तियों को रोक कर आपने चित्त को अपने ध्येय में लगाना प्रत्याहार हैं।

स्वविषयासम्प्रयोगे चित्तस्वरूपनुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहार: (यो०द० 2/54)
प्रणायाम के पत्र में जो प्राणायाम की विधियां बताई गई है उस अनुसार प्राणायाम का अभ्यास करते रहने से मन तथा इन्द्रिया शुद्ध हो जाती है इसके फलस्वरूप बाह्यवृत्तियों को समेट कर मन मे विलीन कर देना ही प्रत्याहार है। 


What is Pratyahara | प्रत्याहार क्या हैं??
What is Pratyahara | प्रत्याहार क्या हैं??


योगी अपनी साधना काल मे अपनी इन्द्रियों के विषयों का त्याग करके चित्त को अपने ध्येय में लगता है उस समय इन्द्रियों का चित्त में स्वयं से चले जाना और विषयो की तरफ न जाना ही प्रत्याहार सिद्धि की पहचान है।
प्रत्याहार क्या है इसे और भी सरल भाषा मे समझना हो तो ऐसे समझ सकते है कि सांसारिक भोग और विलाषिता सामने होते हुए भी उस तरफ खयाल ही न जाये तो उसे प्रत्याहार कहते है। प्रत्याहार के सिद्ध होनेपर प्रत्याहार के समय साधक को ब्रह्मज्ञान नही रहता। जब वह समाजिक व्यवहार के समय उसको ब्रह्मज्ञान आता है क्योंकि उस समय साधक शरीर यात्रा के हेतु से प्रत्याहार को अपने काम मे नही लाता हैं।

तत: परमा वष्यतेन्द्रियाणाम् ।। (यो०सू० 2/55)
महर्षि पतंजलि जी ने प्रत्याहार क्या है ये समझते हुए साधन पाद के अंतिम श्लोक में कहा है कि प्रत्याहार सिद्ध हो जाने के बाद योगी की इन्द्रियाँ पूर्ण रूप से उसके वश में हो जाती है, उनकी स्वन्त्रता का अभाव हो जाता है।
प्रत्याहार सिद्ध हो जाने के बाद इन्द्रिय को जीतने के लिए अन्य साधन की जरूरत नही रहती।

Thursday, September 6, 2018

paranayama different types | प्राणायाम के प्रकार अष्टांगयोग मे |

Paranayama different types

  अष्टांगयोग मे योग की चर्चा करते हुए हमने अध्यन किया यम, नियम, आसान के बारे में अब हम अष्टांग योग के चौथे अंग प्राणायाम के परिचय पर चर्चा करेंगे।
प्राणायाम के अभ्यास से चित्त को नियंत्रित किया जा सकता है, जैसा कि हठ प्रदीपिका मे भी कहा गया है ।

चले वाते चलं चित्तं निश्चले निश्चलं भवेत् ।
योगी स्थाणुत्वमाप्नोति ततो वायुं निरोधयेत् ।। हठ प्र. 2/2
अर्थ:--
प्राणवायु के चलने से चित्त चलायमान होता है और जब प्राण वायु रुकती है तो वो भी रुक जाती है या एकाग्र हो जाती है। सिद्ध योग इसी प्राण के नियमन पर नियंत्रण में कर के समाधि की स्थिति को प्राप्त कर लेते है।
महर्षि पतंजलि ने प्राणायाम का वर्णन करते हुए कहा हैं।

तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायाम: ।  (यो० सू० 2/41)
अर्थ:--
उसके बाद अथार्त आसन के सिद्ध हो जाने के बाद श्वास-प्रश्वास की गति का विच्छेद करना या होना प्राणायाम कहलाता है। सिद्ध योगियों का मत है कि आसन के सिद्ध हो जाने के बाद ही प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए अन्यथा प्राणायाम सिद्ध नही हो सकता क्योंकि इसके लिए शरीर का स्थिर होना अति आवश्यक माना गया है।

   
प्राणायाम के प्रकार अष्टांगयोग मे
प्राणायाम के प्रकार अष्टांगयोग मे



प्राणायाम का अर्थ:--
प्राणायाम शब्द, प्राण और आयाम दो शब्दों से मिलकर बना है, इसमे प्राण जीवनी शक्ति है और आयाम उस मे ठहराव है। हम निरंतर श्वास प्रसवास करते रहते है यह एक अनैच्छिक प्रक्रिया है तथा इसी क्रिया को नियंत्रित करके ऐच्छिक बना लेना व श्वास का पूरक करके कुम्भक करना और फिर इच्छानुसार रेचक करना प्राणायाम होता है।


  प्राण शब्द का अर्थ जीवनी शक्ति से भी लगाया जाता है, प्राण का स्थान हृदय माना गया है, जब हम श्वास लेते है तब वायु हमारे नासा छिद्रों से होकर फेफड़ो तक जाता है।

योग मे प्राणों को भी पाँच भागो मे बाटा है।
1. प्राण
2. अपान
3. समान
4. उदान
5. व्यान

ये पाँच मुख्य प्राण है तथा इनके भी पाँच उप प्राण है,
१. नाग
२.कूर्म
३. कृकल
४. देवदत्त
५. धनंजय
प्राणायाम को विस्तार से समझने के लिए इनके भेदों को भी समझना आवश्यक होता है।
ये तीन प्रकार के होते है।

बाह्याभ्यंतरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः परिदृष्टोदीर्घसूक्ष्मः ।।  ( यो० सू० 2/50)

उक्त सूत्र में तीन प्रकार के प्राणायाम का वर्णन किया गया है।
बाह्यवृति, आभ्यंतरवृत्ति, स्तम्भवृत्ति |
इन तीनो प्रकारों में श्वास को सरलता से जितने समय तक हो सके भीतर, बाहर तथा स्वाभिकावस्था मे रोक देना बताया गया है। इन तीन प्राणायाम के अतिरिक्त एक चौथा प्राणायाम भी है।

बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः ।
इस सूत्र को सरलता से समझना हो तो ऐसा कह सकते है कि यह अपने आप होने वाला एक प्रकार का राजयोग का प्राणायाम है। मन की चंचलता शांत होने के कारण श्वासों की गति आपने आप रुकती है, इसमे तनिक मात्र भी जोर नही दिया जाता कि श्वास लेने है या छोड़ना है या किसी भी स्थिति में रोक लेना है यह स्वयं ही किसी भी अवस्था मे स्वयं लगने वाला प्राणायाम है।
जब व्यक्ति के भीतर और बाहर के विषयों के चिंतन का त्याग हो जाता है तब यह प्राणायाम स्वयं ही लगने लगता है।
पतंजलि जी ने प्राणायाम के वर्णन यही समाप्त किया है और साथ मे (2/53) वे श्लोक में ये भी कहा कि प्राणायाम के अभ्यास से मन मे धारणा की स्थिति आने की योग्यता भी प्राप्त हो जाती है, अर्थात योगी कही भी अपने मन को अनायास ही स्थिर कर लेता हैं। यही प्राणायाम के लाभ है।
अर्थ:--
प्राणवायु के चलने से चित्त चलायमान होता है और जब प्राण वायु रुकती है तो वो भी रुक जाती है या एकाग्र हो जाती है। सिद्ध योग इसी प्राण के नियमन पर नियंत्रण में कर के समाधि की स्थिति को प्राप्त कर लेते है।
महर्षि पतंजलि ने प्राणायाम का वर्णन करते हुए कहा हैं।

तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायाम: ।  (यो० सू० 2/41)
अर्थ:--
उसके बाद अथार्त आसन के सिद्ध हो जाने के बाद श्वास-प्रश्वास की गति का विच्छेद करना या होना प्राणायाम कहलाता है। सिद्ध योगियों का मत है कि आसन के सिद्ध हो जाने के बाद ही प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए अन्यथा प्राणायाम सिद्ध नही हो सकता क्योंकि इसके लिए शरीर का स्थिर होना अति आवश्यक माना गया है।

प्राणायाम का अर्थ:--
प्राणायाम शब्द, प्राण और आयाम दो शब्दों से मिलकर बना है, इसमे प्राण जीवनी शक्ति है और आयाम उस मे ठहराव है। हम निरंतर श्वास प्रसवास करते रहते है यह एक अनैच्छिक प्रक्रिया है तथा इसी क्रिया को नियंत्रित करके ऐच्छिक बना लेना व श्वास का पूरक करके कुम्भक करना और फिर इच्छानुसार रेचक करना प्राणायाम होता है।

  प्राण शब्द का अर्थ जीवनी शक्ति से भी लगाया जाता है, प्राण का स्थान हृदय माना गया है, जब हम श्वास लेते है तब वायु हमारे नासा छिद्रों से होकर फेफड़ो तक जाता है।
योग मे प्राणों को भी पाँच भागो मे बाटा है।
1. प्राण
2. अपान
3. समान
4. उदान
5. व्यान
ये पाँच मुख्य प्राण है तथा इनके भी पाँच उप प्राण है,
१. नाग
२.कूर्म
३. कृकल
४. देवदत्त
५. धनंजय

प्राणायाम को विस्तार से समझने के लिए इनके भेदों को भी समझना आवश्यक होता है।
ये तीन प्रकार के होते है।

बाह्याभ्यंतरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः परिदृष्टोदीर्घसूक्ष्मः ।।  ( यो० सू० 2/50)
उक्त सूत्र में तीन प्रकार के प्राणायाम का वर्णन किया गया है।
बाह्यवृति, आभ्यंतरवृत्ति, स्तम्भवृत्ति |
इन तीनो प्रकारों में श्वास को सरलता से जितने समय तक हो सके भीतर, बाहर तथा स्वाभिकावस्था मे रोक देना बताया गया है। इन तीन प्राणायाम के अतिरिक्त एक चौथा प्राणायाम भी है।

बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः ।। (यो०सू० 2/51)
इस सूत्र को सरलता से समझना हो तो ऐसा कह सकते है कि यह अपने आप होने वाला एक प्रकार का राजयोग का प्राणायाम है। मन की चंचलता शांत होने के कारण श्वासों की गति आपने आप रुकती है, इसमे तनिक मात्र भी जोर नही दिया जाता कि श्वास लेने है या छोड़ना है या किसी भी स्थिति में रोक लेना है यह स्वयं ही किसी भी अवस्था मे स्वयं लगने वाला प्राणायाम है।
जब व्यक्ति के भीतर और बाहर के विषयों के चिंतन का त्याग हो जाता है तब यह प्राणायाम स्वयं ही लगने लगता है।
पतंजलि जी ने प्राणायाम के वर्णन यही समाप्त किया है और साथ मे (2/53) वे श्लोक में ये भी कहा कि प्राणायाम के अभ्यास से मन मे धारणा की स्थिति आने की योग्यता भी प्राप्त हो जाती है, अर्थात योगी कही भी अपने मन को अनायास ही स्थिर कर लेता हैं। यही प्राणायाम के लाभ है।

Wednesday, September 5, 2018

यूजीसी नेट 2018|UGC NET 2018 | NET exam by NTA

यूजीसी नेट 2018:


यूजीसी राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा के लिए पंजीकरण प्रक्रिया राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (एनटीए) की आधिकारिक वेबसाइट, भारत में उच्च शैक्षिक प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं के लिए प्राधिकृत नवगठित परीक्षा आयोजित करने वाली आधिकारिक वेबसाइट पर शुरू हुई है। उम्मीदवार जो इस साल दिसंबर में होने वाली परीक्षा के लिए बैठने में रूचि रखते हैं, वे आधिकारिक वेबसाइट ntanet.nic.in पर विवरण देख सकते हैं।
आप इस लिंक से सीधा फॉर्म भर सकते है:-


ऑनलाइन आवेदन पत्र भरने की आखिरी तारीख 30 सितंबर, 2018 है। इसके अलावा, यूजीसी-नेट की आधिकारिक वेबसाइट पर जारी अधिसूचना के अनुसार, परीक्षा कंप्यूटर आधारित (सीबीटी) प्रारूप में आयोजित की जाएगी। इसके अलावा, पिछले वर्षों के विपरीत एनईटी परीक्षा में तीन पत्रों के बजाय केवल दो पेपर होंगे, जो सीबीएसई या केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा आयोजित किए गए थे।


यूजीसी नेट 2018
यूजीसी नेट 2018

यूजीसी नेट दिसंबर 2018 के लिए ऑनलाइन आवेदन करने के लिए नीचे दिए गए चरणों का पालन करें:

1। एनटीए नेट 2018, ntanet.nic.in की आधिकारिक वेबसाइट पर जाएं
2। ऑनलाइन आवेदन पत्र भरें और सिस्टम जेनरेट किए गए एप्लिकेशन नंबर को नोट करें
3। जेपीजी / जेपीईजी प्रारूप में अभ्यर्थी के फोटो (10 केबी - 200 केबी के बीच) और अभ्यर्थी के हस्ताक्षर (4 केबी - 30 केबी के बीच) की स्कैन की गई छवियां अपलोड करें
4। नेट बैंकिंग का उपयोग करके आवेदन शुल्क भुगतान करें और भुगतान किए गए शुल्क का सबूत रखें
5। शुल्क के सफल प्रेषण के बाद पुष्टिकरण पृष्ठ के कम से कम चार प्रिंटआउट प्रिंट करें
इस बीच, आधिकारिक अधिसूचना यह भी इंगित करती है कि आवेदन पत्र के विवरण में सुधार 8 अक्टूबर, 2018 से 14 अक्टूबर, 2018 तक वेबसाइट पर खुलेगा। अभ्यर्थी एनटीए के यूजीसी नेट दिसंबर 2018 परीक्षा के लिए प्रवेश पत्र डाउनलोड करने में सक्षम होंगे। वेबसाइट 1 9 नवंबर, 2018 से शुरू हो रही है।
शुल्क का विवरण:--

General:-- 800 रुपये।
OBC:-- 400 रुपये।
SC/ST/PwD:-- 200 रुपये।

Sunday, September 2, 2018

अष्टांगयोग का तीसरा अंग आसन |

अष्टांगयोग का तीसरा अंग आसन

महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र के अष्टांग योग में योग के आठ अङ्गों का वर्णन करते हुए योग को विस्तृत रूप में वर्णन किया है। पहले के पोस्ट पढ़ने के लिए  इन पोस्ट को पढ़े।
अब यहां आसन के बारे में सूक्ष्म एवम संक्षेप वर्णन दे रहे है। यह संस्कृत के अस धातु से बना है, इसके दो अर्थ होते है । 1.  बैठने का स्थान, सीट। 

2.  शारीरिक अवस्था।
स्थिरसुखमासनम् ।  ।।यो.सू. 2/४६।।
इस सूत्र में बताया गया है कि किसी भी अवस्था मे सुख पूर्वक निश्चल बैठने का नाम आसन हैं।
योग कहता है कि किसी भी आसान मे बहुत लंबे  समय तक स्थिरता से बैठे रहना आसन सिद्धि का लक्षण है।
हठयोग में आसनों के बहुत सारे तरीके बताए गए हैं, लेकिन महर्षि पतंजलि ने इस सूत्र में कहां है कि जिस भी अवस्था मे आप सुख पूर्वक बैठ सको वो आसन हैं।
यानि साधक को कैसे बैठना है इस बात के लिए पतंजलि जी ने जोर नही दिया है उन्होंने ये साधक के ऊपर छोड़ दिया है,  शायद वे चाहते होंगे योगी अपनी योग्यगत के अनुसार बिना हिले डुले एक अवस्था मे सुख से लंबे समय तक बैठ सके वही उसके लिए सबसे अच्छा आसन होगा।

श्रीमद्भागवत गीता के अध्याय 6 श्लोक 11-13 में---
श्रीमद्भागवत गीता में अष्टांग योग के तीसरे अंग आसन का वर्णन करते हुए कहाँ है कि योगी जिस आसन में बैठ कर अभ्यास करें व स्थिर व सीधा होना चाहिए, जबकि योगी की स्थिति का वर्णन करते हुए कहा है कि सिर, गर्दन, शरीर एक सीध में होने चाहिए यहां भी किसी विशेष आसन का वर्णन नही किया है।

अष्टांगयोग का तीसरा अंग आसन
अष्टांगयोग का तीसरा अंग आसन

घेरण्ड सहिंता:--
अष्टांगयोग के तीसरे अंग आसन का घेरणसहिंता में भी वर्णन मिलता है।

आसनानि समस्तानि------------ शुभम् ।। (घेरण्ड संहिता)
मतलब घेरण्ड ऋषि कहते है कि संसार मे जितने भी जंतु है, उतने ही संख्या आसनो की भी है। भगवान शिव जी ने चौरासी लाख आसन बताये है उसमें से चौरासी बहुत ही प्रमुख आसन है, परंतु इनमे भी बत्तीस ऐसे आसनो का वर्णन घेरण्ड ऋषि करते है जो कि स्थिर अवस्था मे बैठ कर किये जा सकते है।

                    आसान भेद
सिद्धं पद्मं तथा भद्रं मुक्तं वज्रं च स्वस्तिकम् ।
सिंहं च गोमुखं वीरं धनुरासनमेव च ।।3।।
मृतं गुप्तं तथा मात्स्यं मत्स्येन्द्रासनमेव च ।
गोरक्षं पश्चिमोत्तानमुत्कटं संकटं तथा  ।।4।।
मयूरं कुक्कुटं कूर्मं तथा चोत्तानकुर्मकम् ।
उत्तानमंडुकमं वृक्षं मण्डुकमं गरुडं वृषम्  ।।5।।
शलभं मकरं चोष्ट्रं भुजङ्गं योगमासनम् ।
द्वात्रिंशदासनान्येव मर्त्ये सिद्धिप्रदानि च  ।।6।।

                                              (घेरण्ड संहिता)
अर्थ:--
इस मृत्यु लोक में इन्ही आसनो के अभ्यास से सिद्धि प्राप्त हो सकती है।
(1) सिद्धासन, (2) पदमासन, (3) भद्रासन, (4) मुक्तासन, (5)वज्रासन, (6) स्वस्तिकासन, (7) सिंहासन, (8) गोमुखासन, (9) वीरासन, (10) धनुरासन, (11) मृतासन (शवासन), (12) गुप्तासन, (13) मत्स्यासन, (14) मत्स्येन्द्रासन, (15) गोरक्षासन, (16) पश्चिमोत्तानासन, (17) उत्कटासन, (18) संकटासन, (19) मयूरासन, (20) कुक्कुटासन, (21) कुर्मासन, (22) उत्तान कुर्मासन, (23) मण्डूकासन, (24) उत्तान मण्डूकासन, (25) वृक्षासन, (26) गरुड़ासन, (27) वृषासन, (28) शलभासन, (29) मकरासन, (30) उष्ट्रासन, (31) भुजंगासन, (32) योगासन। 

इन सभी आसनो को एक- एक करके विस्तार से अगली पोस्ट में बताएंगे।

हठ प्रदीपिका :--  हठ प्रदीपिका के लेखक गुरु गोरक्षनाथ के शिष्य स्वामी स्वात्माराम जी ने इस 15 प्रकार के आसन का वर्णन किया है जो निम्न प्रकार है।
(1) स्वस्तिकासन, (2) गोमुखासन, (3) वीरासन, (4) कुर्मासन, (5) कुक्कुटासन, (6) उत्तानकुर्मासन, (7) धनुरासन, (8) मत्स्येन्द्रासन, (9) पश्चिमोत्तानासन, (10) मयूरासन, (11) शवासन, (12) सिद्धासन, (13) पद्मासन, (14) सिंहासन, (15) भद्रासन  ।

शिवसंहिता:--
शिवसंहिता में संस्कृत भाषा मे योग के विषय मे वर्णन दिया गया है, माना जाता है कि स्वयं भगवान शिव ने माता पार्वती को योग के विषय से अवगत कराया था।