अष्टांगयोग का तीसरा अंग आसन |

अष्टांगयोग का तीसरा अंग आसन

महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र के अष्टांग योग में योग के आठ अङ्गों का वर्णन करते हुए योग को विस्तृत रूप में वर्णन किया है। पहले के पोस्ट पढ़ने के लिए  इन पोस्ट को पढ़े।
अब यहां आसन के बारे में सूक्ष्म एवम संक्षेप वर्णन दे रहे है। यह संस्कृत के अस धातु से बना है, इसके दो अर्थ होते है । 1.  बैठने का स्थान, सीट। 

2.  शारीरिक अवस्था।
स्थिरसुखमासनम् ।  ।।यो.सू. 2/४६।।
इस सूत्र में बताया गया है कि किसी भी अवस्था मे सुख पूर्वक निश्चल बैठने का नाम आसन हैं।
योग कहता है कि किसी भी आसान मे बहुत लंबे  समय तक स्थिरता से बैठे रहना आसन सिद्धि का लक्षण है।
हठयोग में आसनों के बहुत सारे तरीके बताए गए हैं, लेकिन महर्षि पतंजलि ने इस सूत्र में कहां है कि जिस भी अवस्था मे आप सुख पूर्वक बैठ सको वो आसन हैं।
यानि साधक को कैसे बैठना है इस बात के लिए पतंजलि जी ने जोर नही दिया है उन्होंने ये साधक के ऊपर छोड़ दिया है,  शायद वे चाहते होंगे योगी अपनी योग्यगत के अनुसार बिना हिले डुले एक अवस्था मे सुख से लंबे समय तक बैठ सके वही उसके लिए सबसे अच्छा आसन होगा।

श्रीमद्भागवत गीता के अध्याय 6 श्लोक 11-13 में---
श्रीमद्भागवत गीता में अष्टांग योग के तीसरे अंग आसन का वर्णन करते हुए कहाँ है कि योगी जिस आसन में बैठ कर अभ्यास करें व स्थिर व सीधा होना चाहिए, जबकि योगी की स्थिति का वर्णन करते हुए कहा है कि सिर, गर्दन, शरीर एक सीध में होने चाहिए यहां भी किसी विशेष आसन का वर्णन नही किया है।

अष्टांगयोग का तीसरा अंग आसन
अष्टांगयोग का तीसरा अंग आसन

घेरण्ड सहिंता:--
अष्टांगयोग के तीसरे अंग आसन का घेरणसहिंता में भी वर्णन मिलता है।

आसनानि समस्तानि------------ शुभम् ।। (घेरण्ड संहिता)
मतलब घेरण्ड ऋषि कहते है कि संसार मे जितने भी जंतु है, उतने ही संख्या आसनो की भी है। भगवान शिव जी ने चौरासी लाख आसन बताये है उसमें से चौरासी बहुत ही प्रमुख आसन है, परंतु इनमे भी बत्तीस ऐसे आसनो का वर्णन घेरण्ड ऋषि करते है जो कि स्थिर अवस्था मे बैठ कर किये जा सकते है।

                    आसान भेद
सिद्धं पद्मं तथा भद्रं मुक्तं वज्रं च स्वस्तिकम् ।
सिंहं च गोमुखं वीरं धनुरासनमेव च ।।3।।
मृतं गुप्तं तथा मात्स्यं मत्स्येन्द्रासनमेव च ।
गोरक्षं पश्चिमोत्तानमुत्कटं संकटं तथा  ।।4।।
मयूरं कुक्कुटं कूर्मं तथा चोत्तानकुर्मकम् ।
उत्तानमंडुकमं वृक्षं मण्डुकमं गरुडं वृषम्  ।।5।।
शलभं मकरं चोष्ट्रं भुजङ्गं योगमासनम् ।
द्वात्रिंशदासनान्येव मर्त्ये सिद्धिप्रदानि च  ।।6।।

                                              (घेरण्ड संहिता)
अर्थ:--
इस मृत्यु लोक में इन्ही आसनो के अभ्यास से सिद्धि प्राप्त हो सकती है।
(1) सिद्धासन, (2) पदमासन, (3) भद्रासन, (4) मुक्तासन, (5)वज्रासन, (6) स्वस्तिकासन, (7) सिंहासन, (8) गोमुखासन, (9) वीरासन, (10) धनुरासन, (11) मृतासन (शवासन), (12) गुप्तासन, (13) मत्स्यासन, (14) मत्स्येन्द्रासन, (15) गोरक्षासन, (16) पश्चिमोत्तानासन, (17) उत्कटासन, (18) संकटासन, (19) मयूरासन, (20) कुक्कुटासन, (21) कुर्मासन, (22) उत्तान कुर्मासन, (23) मण्डूकासन, (24) उत्तान मण्डूकासन, (25) वृक्षासन, (26) गरुड़ासन, (27) वृषासन, (28) शलभासन, (29) मकरासन, (30) उष्ट्रासन, (31) भुजंगासन, (32) योगासन। 

इन सभी आसनो को एक- एक करके विस्तार से अगली पोस्ट में बताएंगे।

हठ प्रदीपिका :--  हठ प्रदीपिका के लेखक गुरु गोरक्षनाथ के शिष्य स्वामी स्वात्माराम जी ने इस 15 प्रकार के आसन का वर्णन किया है जो निम्न प्रकार है।
(1) स्वस्तिकासन, (2) गोमुखासन, (3) वीरासन, (4) कुर्मासन, (5) कुक्कुटासन, (6) उत्तानकुर्मासन, (7) धनुरासन, (8) मत्स्येन्द्रासन, (9) पश्चिमोत्तानासन, (10) मयूरासन, (11) शवासन, (12) सिद्धासन, (13) पद्मासन, (14) सिंहासन, (15) भद्रासन  ।

शिवसंहिता:--
शिवसंहिता में संस्कृत भाषा मे योग के विषय मे वर्णन दिया गया है, माना जाता है कि स्वयं भगवान शिव ने माता पार्वती को योग के विषय से अवगत कराया था।
अष्टांगयोग का तीसरा अंग आसन | अष्टांगयोग का तीसरा अंग आसन | Reviewed by Shivyogi on Sunday, September 02, 2018 Rating: 5

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