Thursday, September 6, 2018

paranayama different types | प्राणायाम के प्रकार अष्टांगयोग मे |

Paranayama different types

  अष्टांगयोग मे योग की चर्चा करते हुए हमने अध्यन किया यम, नियम, आसान के बारे में अब हम अष्टांग योग के चौथे अंग प्राणायाम के परिचय पर चर्चा करेंगे।
प्राणायाम के अभ्यास से चित्त को नियंत्रित किया जा सकता है, जैसा कि हठ प्रदीपिका मे भी कहा गया है ।

चले वाते चलं चित्तं निश्चले निश्चलं भवेत् ।
योगी स्थाणुत्वमाप्नोति ततो वायुं निरोधयेत् ।। हठ प्र. 2/2
अर्थ:--
प्राणवायु के चलने से चित्त चलायमान होता है और जब प्राण वायु रुकती है तो वो भी रुक जाती है या एकाग्र हो जाती है। सिद्ध योग इसी प्राण के नियमन पर नियंत्रण में कर के समाधि की स्थिति को प्राप्त कर लेते है।
महर्षि पतंजलि ने प्राणायाम का वर्णन करते हुए कहा हैं।

तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायाम: ।  (यो० सू० 2/41)
अर्थ:--
उसके बाद अथार्त आसन के सिद्ध हो जाने के बाद श्वास-प्रश्वास की गति का विच्छेद करना या होना प्राणायाम कहलाता है। सिद्ध योगियों का मत है कि आसन के सिद्ध हो जाने के बाद ही प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए अन्यथा प्राणायाम सिद्ध नही हो सकता क्योंकि इसके लिए शरीर का स्थिर होना अति आवश्यक माना गया है।

   
प्राणायाम के प्रकार अष्टांगयोग मे
प्राणायाम के प्रकार अष्टांगयोग मे



प्राणायाम का अर्थ:--
प्राणायाम शब्द, प्राण और आयाम दो शब्दों से मिलकर बना है, इसमे प्राण जीवनी शक्ति है और आयाम उस मे ठहराव है। हम निरंतर श्वास प्रसवास करते रहते है यह एक अनैच्छिक प्रक्रिया है तथा इसी क्रिया को नियंत्रित करके ऐच्छिक बना लेना व श्वास का पूरक करके कुम्भक करना और फिर इच्छानुसार रेचक करना प्राणायाम होता है।


  प्राण शब्द का अर्थ जीवनी शक्ति से भी लगाया जाता है, प्राण का स्थान हृदय माना गया है, जब हम श्वास लेते है तब वायु हमारे नासा छिद्रों से होकर फेफड़ो तक जाता है।

योग मे प्राणों को भी पाँच भागो मे बाटा है।
1. प्राण
2. अपान
3. समान
4. उदान
5. व्यान

ये पाँच मुख्य प्राण है तथा इनके भी पाँच उप प्राण है,
१. नाग
२.कूर्म
३. कृकल
४. देवदत्त
५. धनंजय
प्राणायाम को विस्तार से समझने के लिए इनके भेदों को भी समझना आवश्यक होता है।
ये तीन प्रकार के होते है।

बाह्याभ्यंतरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः परिदृष्टोदीर्घसूक्ष्मः ।।  ( यो० सू० 2/50)

उक्त सूत्र में तीन प्रकार के प्राणायाम का वर्णन किया गया है।
बाह्यवृति, आभ्यंतरवृत्ति, स्तम्भवृत्ति |
इन तीनो प्रकारों में श्वास को सरलता से जितने समय तक हो सके भीतर, बाहर तथा स्वाभिकावस्था मे रोक देना बताया गया है। इन तीन प्राणायाम के अतिरिक्त एक चौथा प्राणायाम भी है।

बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः ।
इस सूत्र को सरलता से समझना हो तो ऐसा कह सकते है कि यह अपने आप होने वाला एक प्रकार का राजयोग का प्राणायाम है। मन की चंचलता शांत होने के कारण श्वासों की गति आपने आप रुकती है, इसमे तनिक मात्र भी जोर नही दिया जाता कि श्वास लेने है या छोड़ना है या किसी भी स्थिति में रोक लेना है यह स्वयं ही किसी भी अवस्था मे स्वयं लगने वाला प्राणायाम है।
जब व्यक्ति के भीतर और बाहर के विषयों के चिंतन का त्याग हो जाता है तब यह प्राणायाम स्वयं ही लगने लगता है।
पतंजलि जी ने प्राणायाम के वर्णन यही समाप्त किया है और साथ मे (2/53) वे श्लोक में ये भी कहा कि प्राणायाम के अभ्यास से मन मे धारणा की स्थिति आने की योग्यता भी प्राप्त हो जाती है, अर्थात योगी कही भी अपने मन को अनायास ही स्थिर कर लेता हैं। यही प्राणायाम के लाभ है।
अर्थ:--
प्राणवायु के चलने से चित्त चलायमान होता है और जब प्राण वायु रुकती है तो वो भी रुक जाती है या एकाग्र हो जाती है। सिद्ध योग इसी प्राण के नियमन पर नियंत्रण में कर के समाधि की स्थिति को प्राप्त कर लेते है।
महर्षि पतंजलि ने प्राणायाम का वर्णन करते हुए कहा हैं।

तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायाम: ।  (यो० सू० 2/41)
अर्थ:--
उसके बाद अथार्त आसन के सिद्ध हो जाने के बाद श्वास-प्रश्वास की गति का विच्छेद करना या होना प्राणायाम कहलाता है। सिद्ध योगियों का मत है कि आसन के सिद्ध हो जाने के बाद ही प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए अन्यथा प्राणायाम सिद्ध नही हो सकता क्योंकि इसके लिए शरीर का स्थिर होना अति आवश्यक माना गया है।

प्राणायाम का अर्थ:--
प्राणायाम शब्द, प्राण और आयाम दो शब्दों से मिलकर बना है, इसमे प्राण जीवनी शक्ति है और आयाम उस मे ठहराव है। हम निरंतर श्वास प्रसवास करते रहते है यह एक अनैच्छिक प्रक्रिया है तथा इसी क्रिया को नियंत्रित करके ऐच्छिक बना लेना व श्वास का पूरक करके कुम्भक करना और फिर इच्छानुसार रेचक करना प्राणायाम होता है।

  प्राण शब्द का अर्थ जीवनी शक्ति से भी लगाया जाता है, प्राण का स्थान हृदय माना गया है, जब हम श्वास लेते है तब वायु हमारे नासा छिद्रों से होकर फेफड़ो तक जाता है।
योग मे प्राणों को भी पाँच भागो मे बाटा है।
1. प्राण
2. अपान
3. समान
4. उदान
5. व्यान
ये पाँच मुख्य प्राण है तथा इनके भी पाँच उप प्राण है,
१. नाग
२.कूर्म
३. कृकल
४. देवदत्त
५. धनंजय

प्राणायाम को विस्तार से समझने के लिए इनके भेदों को भी समझना आवश्यक होता है।
ये तीन प्रकार के होते है।

बाह्याभ्यंतरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः परिदृष्टोदीर्घसूक्ष्मः ।।  ( यो० सू० 2/50)
उक्त सूत्र में तीन प्रकार के प्राणायाम का वर्णन किया गया है।
बाह्यवृति, आभ्यंतरवृत्ति, स्तम्भवृत्ति |
इन तीनो प्रकारों में श्वास को सरलता से जितने समय तक हो सके भीतर, बाहर तथा स्वाभिकावस्था मे रोक देना बताया गया है। इन तीन प्राणायाम के अतिरिक्त एक चौथा प्राणायाम भी है।

बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः ।। (यो०सू० 2/51)
इस सूत्र को सरलता से समझना हो तो ऐसा कह सकते है कि यह अपने आप होने वाला एक प्रकार का राजयोग का प्राणायाम है। मन की चंचलता शांत होने के कारण श्वासों की गति आपने आप रुकती है, इसमे तनिक मात्र भी जोर नही दिया जाता कि श्वास लेने है या छोड़ना है या किसी भी स्थिति में रोक लेना है यह स्वयं ही किसी भी अवस्था मे स्वयं लगने वाला प्राणायाम है।
जब व्यक्ति के भीतर और बाहर के विषयों के चिंतन का त्याग हो जाता है तब यह प्राणायाम स्वयं ही लगने लगता है।
पतंजलि जी ने प्राणायाम के वर्णन यही समाप्त किया है और साथ मे (2/53) वे श्लोक में ये भी कहा कि प्राणायाम के अभ्यास से मन मे धारणा की स्थिति आने की योग्यता भी प्राप्त हो जाती है, अर्थात योगी कही भी अपने मन को अनायास ही स्थिर कर लेता हैं। यही प्राणायाम के लाभ है।

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