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What is Pratyahara | प्रत्याहार क्या हैं??

Pratyahara| प्रत्याहार:--

प्रत्याहार पतंजलि कृत योगसूत्र के अनुसार योग के पांचवें अंग के रूप में आता है।

प्रत्याहार क्या है :-
प्रत्याहार का अर्थ होता है बाह्यवृत्तियों को रोक कर आपने चित्त को अपने ध्येय में लगाना प्रत्याहार हैं।

स्वविषयासम्प्रयोगे चित्तस्वरूपनुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहार: (यो०द० 2/54)
प्रणायाम के पत्र में जो प्राणायाम की विधियां बताई गई है उस अनुसार प्राणायाम का अभ्यास करते रहने से मन तथा इन्द्रिया शुद्ध हो जाती है इसके फलस्वरूप बाह्यवृत्तियों को समेट कर मन मे विलीन कर देना ही प्रत्याहार है। 


What is Pratyahara | प्रत्याहार क्या हैं??
What is Pratyahara | प्रत्याहार क्या हैं??


योगी अपनी साधना काल मे अपनी इन्द्रियों के विषयों का त्याग करके चित्त को अपने ध्येय में लगता है उस समय इन्द्रियों का चित्त में स्वयं से चले जाना और विषयो की तरफ न जाना ही प्रत्याहार सिद्धि की पहचान है।
प्रत्याहार क्या है इसे और भी सरल भाषा मे समझना हो तो ऐसे समझ सकते है कि सांसारिक भोग और विलाषिता सामने होते हुए भी उस तरफ खयाल ही न जाये तो उसे प्रत्याहार कहते है। प्रत्याहार के सिद्ध होनेपर प्रत्याहार के समय साधक को ब्रह्मज्ञान नही रहता। जब वह समाजिक व्यवहार के समय उसको ब्रह्मज्ञान आता है क्योंकि उस समय साधक शरीर यात्रा के हेतु से प्रत्याहार को अपने काम मे नही लाता हैं।

तत: परमा वष्यतेन्द्रियाणाम् ।। (यो०सू० 2/55)
महर्षि पतंजलि जी ने प्रत्याहार क्या है ये समझते हुए साधन पाद के अंतिम श्लोक में कहा है कि प्रत्याहार सिद्ध हो जाने के बाद योगी की इन्द्रियाँ पूर्ण रूप से उसके वश में हो जाती है, उनकी स्वन्त्रता का अभाव हो जाता है।
प्रत्याहार सिद्ध हो जाने के बाद इन्द्रिय को जीतने के लिए अन्य साधन की जरूरत नही रहती।

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