What is meditation/dhyan | ध्यान क्या है ?

                    What is meditation/dhyan | ध्यान क्या है ?

ध्यान क्या है----

"इस विषय मे महर्षि पतंजलि जी ने योगदर्शन के  अस्विट्भति पाद में वर्णन करते हुए कहाँ है कि साधक जब किसी ध्येय में चित्त को लगाता है और उसी ध्येय में चित्त का एकाग्र हो जाना ध्यान होता है।" 

पतंजलि योग दर्शन https://www.yogyatri.in/2018/08/yoga-sutras-patanjali.html


"ध्यान क्या है" | 

 What is meditation

ध्यान की अवधारणा इस प्रकार है।

संस्कृत शब्दार्थ कौस्तुभ के अनुसार--
ध्यान शब्द की व्युत्पति 'ध्यै' धातु में 'ल्युट्' प्रत्यय लगाकर निष्पन्न होता है इसका अर्थ होता है मनन, चिंतन, विचार आदि।
         ---(संस्कृत शब्दार्थ कौस्तुभ---- पृ० 575)

ध्यान क्या है? | what is meditation
what is meditation | ध्यान क्या है?


ध्यान क्या है

यह बताते हुए महर्षि पतंजलि जी योगसूत्र में कहते  है

"तत्र प्रत्यैकतानता ध्यानम्" ।।   (योगसूत्र--३/२)

अर्थात् "जिस स्थान पर धारणा का अभ्यास किया गया है उसी स्थान पर चित्त की एकतानता -निरंतरता बने रहना को ही ध्यान कहते है।"

व्यास जी ने ध्यान के बारे में कहां है---

"तस्मिन् देशे ध्येयालम्बनस्य प्रत्ययस्यैकतानता सदृशप्रवाहः प्रत्ययान्तरेणापरामृष्टो ध्यानम्"
                                                                                                                          (यो. सू. व्यासभाष्य---३/२)

इस सूत्र में ध्यान का स्वरूप बतलाया गया है।
योग जिज्ञासुओ को ध्यान के विषय में विशेष रूप से जानना चाहिए। ईश्वर के स्वरूप को अच्छे प्रकार से जान लेना चाहिए। यदि साधक ईश्वर के स्वरूप को ठीक प्रकार से नही जानते अथवा विपरीत जानते है तो ध्यान में सफलता नही मिलती। जैसे शब्द प्रमाण से यह जान लिया कि ईश्वर सर्व-व्यापक, सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान, आनंदस्वरूप हैं। ध्यान करते समय भी ईश्वर को वैसा ही जानकर उसका ध्यान करना चाहिए। जो वस्तु जैसी है उसको वैसा ही जानकर ध्यान करना चाहिए। ध्यान करते समय जिस पदार्थ का ध्यान किया जाता है उसके अलावा किसी ओर वस्तु का ध्यान भी चित्त में नही आना चाहिए और न ही इन्द्रियों से किसी पदार्थ को देखने का प्रयत्न करना चाहिए अगर ध्यान के बीच मे भी किसी अन्य वस्तु में ध्यान जाये तो भी उसे वही रोक कर वापिस पहले की वस्तु म् ही ध्यान लो लगाने का प्रतान्य कारण चाहिये।

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भास्वती टीकाकार हरिहरानन्द जी कहते है कि सदृश्य प्रवाह का अर्थ है जिस ध्येय विषयक पहली वृत्ति हो उसी विषयक दुसरी, तीसरी, चौथी इसी प्रकार की वृत्ति बनी रहे, अन्य व्यवधान रूप वृत्ति न आएं। इसी सदृश्य प्रवाह को तैल की धारा के समान कहा गया है।
( योग सूत्र भास्वती टीका--पृ० २८३)

गोरक्ष संहिता में 'समृ चिंतायाम्' धातु से निष्पन्न  चिंतन अर्थ को ध्यान के संदर्भ में प्रयुक्त किया है----

"समृत्येव सर्वाचिन्तायां धातुरेक: प्रपद्मते।
यश्चिते निर्मला चिंता तद् विध्यानं प्रचक्षते"।।
                                                                 (गोरक्षसंहिता---२/६१)

इस सूत्र में ध्यान का अर्थ प्रकट करते हुए ऋषि दयानन्द कहते है ध्यैय के ज्ञान के अतिरिक्त अन्य पदार्थो के ज्ञान का अभाव हो जाना ही ध्यान है।
इसी बात को स्वामी लक्षणानन्द कहते हैं कि "धारणा के पीछे उसी देश मे ध्यान करने और आश्रय लेने के योग्य जो अन्तर्यामी व्यापक परमेश्वर है, उसके प्रकाश और आनंद में अत्यंत विचार और प्रेम भक्ति के साथ इस प्रकार प्रवेश करना कि जैसे समुद्र के बीच मे नदी प्रवेश करती है। उस समय मे ईश्वर को छोड़ किसी ओर पदार्थ का स्मरण नही करना, किन्तु इसी अंतर्यामी के स्वरूप और ज्ञान में मग्न हो जाना, इसी का नाम ध्यान है"।
गीता में भी कहा गया है---

 'भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्'
                                                                                     --(गीता--8/10)

अर्थात् चंचलरहित निश्चल मन से पहले हृदय कमल में चित्त को स्थिर करे, फिर ऊपर की ओर जाने वाली कुण्डली शक्ति को भूमध्य में प्राण को स्थापित कर उसभक्ति स्वरूप का ध्यान करता हुआ उस दिव्य रूप परम पुरूष परमात्मा को ही प्राप्त होता हैं।

इसी प्रकार गीता के 6/12,13,14 श्लोको में भी ध्यान योग का वर्णन किया है। विवेक मार्तण्ड (वि. मा. ---6/159--160) के अनुसार चित्त का तत्व में निश्चल होना ध्यान कहलाता है।


1. घेरण्ड संहिता---- घेरण्ड संहिता में ध्यान के तीन प्रकार कहे गए हैं--


"स्थूलं ज्योतिस्तथासूक्ष्मं ध्यानस्य त्रिविधं विदुः।
स्थूलं मूर्तिमयं प्रोक्तं ज्योतिस्तेजोमयं तथा।
सूक्ष्मं बिन्दुमयं ब्रह्म कुण्डली परदेवता ।।
                                                             --(घे० सं०-- 6/1)

ध्यान के तीन भेद-- स्थूल, ज्योति तथा सूक्ष्म हैं।
स्थूल ध्यान मूर्तिमय इष्टदेव का ध्यान, ज्योति ध्यान ज्योतिस्वरूप ब्रह्म का ध्यान तथा सूक्ष्म ध्यान कुंडलिनी शक्ति का ध्यान है।

1. स्थूल ध्यान-- इस विधि में गुरु के स्थूल रूप का ध्यान हृदय या सहस्त्रार में करने का विधान है।

"स्वकीय हृदये---------------------------------------- स्थूलध्यानमिदं विदुः।। 
                                                                                                        ---(घेरण्ड संहिता--6/2--8)

अर्थ--

  अपने हृदय का ध्यान करते हुए अमृतसगर की कल्पना करें। उसके बीच रत्नों से पूर्ण द्वीप जिसकी बालू भी रत्नपूर्ण है की कल्पना करें। चारो और से फलदार वृक्ष लगे है। सुगंधित पुष्प मालती, केशर, चम्पा आदि आदि शुशोभित है। योगी द्वीप के मध्य में फलफूल वाले कल्पवृक्ष की कल्पना करें जिसकी चारो शाखाओ में चारों वेद सुशोभित है।  भ्रमरों का गुंजन व कोयल की कूक मन को मोहने वाली है, योगी रत्नों से जड़ित मंडप म् सूंदर पलंग की कल्पना करे, जिसपर इष्टदेव विराजित हो। अब इन्ही इष्ट देव पर ध्यान केंद्रीत करें जैसे गुरु ने शिक्षा दी हो। इसी प्रकार सहस्त्रार पर भी ध्यान करने का उल्लेख है।

2. ज्योति ध्यान-- तेजोमय ब्रह्म के ज्ञान को ज्योति ध्यान कहा गया है।


"मूलाधार कुण्डलिनी------------------------------ तेजोध्यानं तदेव हि"।।
                                                                                                     (घे० सं० 6/ 6-7)
 सर्पिणि की आकार वाली कुण्डलिनी शक्ति मूलाधार चक्र में स्थित है। दीपक की लौ की तरह ज्योति रूप जीवात्मा का वही स्थान है। तेजोमय ब्रह्म का वही पर ध्यान करना ज्योतिध्यान कहलाता है। भ्रूमध्य और मन के उर्ध्व भाग में जो प्रणवात्मक ज्योति है, उस ज्योति रूप प्रणव का ध्यान ही तेजोध्यान है।

3. सूक्ष्मं ध्यान--  कुण्डलिनी शक्ति का ध्यान सूक्ष्म ध्यान कहलाता है।


तेजोध्यानं श्रुतं ----------------------------------------------------------- भवेद्यस्मात्तस्माद् ध्यानं विशिष्यते ।।
                                                                                                                                      --(घे० सं०-- 18-22)



 तुमने तेजोध्यान (ज्योतिध्यान) के विषय मे सुना अब शुक्ष्मध्यान के विषय मे सुनो, अत्यंत शौभाग्य से कुण्डलिनी शक्ति जागृत होती है। आत्मा के साथ संयुक्त हो, वह नेत्र मार्ग से निकलकर उर्ध्व भाग में स्थित राजमार्ग में विचरण करती है। शुक्ष्म और चंचल बुद्धि होने के कारण वह दिखाई नही देती। शाम्भवी मुद्रा में बैठकर योगी कुण्डलिनी शक्ति का ध्यान करे तो यही शुक्ष्म ध्यान है। देवताओं के लिए भी यह ध्यान दुर्लभ है। स्थूल ध्यान से सौ गुणा श्रेष्ठ ज्योतिध्यान तथा ज्योतिध्यान से लाख गुना श्रेष्ठ शूक्ष्मध्यान है। ये बात घेरण्ड ऋषि राजा चण्ड को संबोधित करते हुए बताते है और कहते है कि मैंने यह बहुत दुर्लभ ध्यानयोग कहा है इससे आत्मसाक्षात्कार होता है।

भक्तिसागर-----  भक्तिसागर में स्वामी चरणदास जी ने ध्यान के चार प्रकार कहे है-----

1. पदस्थ ध्यान
2. पिण्डस्थ ध्यान
3. रूपस्थ ध्यान
4. रूपातीत ध्यान

शाण्डिल्योपनिषद् ----- 

दो प्रकार के बताए है।
१. सगुण-- देवप्रतिमा का ध्यान।
२. निर्गुण-- विशुद्धात्मा का ध्यान ।

वशिष्ठ संहिता --  दो प्रकार के ध्यान है ।

सगुण तथा निर्गुण
सगुण के 5 प्रकार है 
निर्गुण 1 ही प्रकार का है।
इसमे भी शगुण ध्यान में भगवान विष्णु के रूपो के व उनके अंगों पर ध्यान करने को कहा गया है।
निर्गुण ध्यान में ब्रह्म स्वरूप ईश्वर का ध्यान करने का वर्णन किया गया है।













What is meditation/dhyan | ध्यान क्या है ? What is meditation/dhyan | ध्यान क्या है ? Reviewed by Shivyogi on Wednesday, December 26, 2018 Rating: 5

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